eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 46

jk " V™h ; , drk

दलित-मुशसलम गठजोड़ पर विसिार से लिखा था , जिसे एक भयानक सचि के रूप में देखे जाने की जरुरत हैी
तथाकथित दलित-मुशसलम गठजोड़ का डॉ भीम राव आंबेडकर ने कभी समर्थन नहीं किया । उनका मानना था कि रा्ट्र निर्माण के लिए भूमि , वहां का समाज तथा समाज की एक श्रे्ठ परंपरा , यह तीनों अनिवार्य अंग हैं । रा्ट्र सिर्फ भौतिक ईकाई नहीं है । डॉ आंबेडकर का कहना था कि रा्ट्र एक जीवित ईकाई है और यह एक आशतमक सिद्धांत है । इसके लिए समृहियों की बहुमू्य विरासत का सामानय अधिकार तथा उनकी वर्तमान काल में वासिहवक सहमति आव्यक है । एक साथ रहने की इ्छा तथा अविभाजित विरासत , जो हमारे पूर्वजों ने हमें सौपी है , उसे कायम रखने की प्रबल इ्छा का होना जरुरी है । एक वयश्ि की भांति रा्ट्र भूतकालीन लोगों द्ारा किए गए सतत प्रयास , तयाग और देशभक्ि का परिणाम है । यहां पुरुर्ों की आराधना एक नयाययु्ि बात है ्योंकि इनिी पुरुर्ों ने हमें बनाया है । वीरतापूर्ण भूतकाल , श्रे्ठ पूर्वज और उनकी महान यश गाथाएं , हमारी सामाजिक पूंजी के ढांचिे का निर्माण करती है , जिस पर हम अपने रा्ट्र की रचिना कर सकते हैं । रा्ट्र का निर्माण सिर्फ भूमि से नहीं होता है , बल्क वहां पर रहने वाला समाज ही उस रा्ट्र का निर्माण करता है ।
डॉ आंबेडकर रा्ट्र की परिभार्ा करते हुए उसके लिए अपरिहार्य ततवों का भी उ्लेख करते हैं । रा्ट्र के समबनध में उनिोंने जो कुछ भी कहा , उसे आदर्श कहा जा सकता है । रा्ट्र के भूतकाल और वर्तमान के प्रति देखने का दृष्टिकोण सामान होना चिाहिए , जिस समाज की रा्ट्र के प्रति ऐसी भावना होती है , वही समाज रा्ट्र का निर्माण करता है । डॉ आंबेडकर कहते है कि भूतकालीन यश , सामान रूप से सुख-दुःख और आशा में हिससा बंटिाना आदि बातें एक रा्ट्र का की घोतक है । एक साथ मिलकर कष्ट उठाना , आनंद की समृहियों की तुलना में एकता के लिए अधिक महतव का
आधार है । रा्ट्रीय महत्व की समृहियां तथा ऐसी ही दुखद घटिनाओं के उदाहरण विजय की तुलना में अधिक मू्यवान है ्योंकि इसमें कर्तवयबोध जागृत होता है और सामूहिक प्रयत्ों की जरुरत होती है । मुशसलम लीग द्ारा अपने लाभ के लिए किए जा रहे समझौतों को देखकर यह धारणा बनती है कि जब कुछ राजनीतिक दल मिलकर अपने अपने लाभ के लिए समझौते करते है तो रा्ट्र की अवधारणा विखंडित होती हुई दिखती है । रा्ट्र , राजनीतिक दलों के निहित समझौतों से ऊपर की सत्ा है । इस बारे में डॉ आंबेडकर ने लिखा है कि संधिपरक दल इस बात में वयसि रहते है कि अंतिम लक्य तक पहुंचिने के संघर््य में दलों के मधय संतुलन
बिगड़ने न पाए ।
डॉ आंबेडकर ने समपूण्य भारत वर््य को एक रा्ट्र के रूप में सवीकार किया था । उनका मानना था कि इस रा्ट्र का निर्माण कोई सौ-दो सौ वर््य में नहीं हुआ है । इसको प्रकृति , समाज एवं उसकी संसकृहि ने एक रा्ट्र के अखंड सवरुप के साथ निर्मित किया है । देश की एकता और अखंडता इस रा्ट्र की सवाभाविक प्रकृति है । इस मौलिक तथय को नहीं भूलना चिाहिए कि प्रकृति ने भारत को एकत्रित भौगोलिक इकाई के रूप में निर्मित किया है । इसकी एकता उतनी ही प्राचिीन है , जितनी प्राचिीन प्रकृति है । पाकिसिान से समबंहधि किसी भी विवाद पर हवचिार करते समय यह तथय आंखों से ओझल
46 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf fnlEcj 2020