eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 50

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असफल हो चिुके हैं और मुशसलम हवचिारधारा में पूर्ण उलटिफेर हो गया है , तब उन निश्चित कारणों को भी जानना आव्यक है , जिनके फलसवरूप उ्ि परिणाम उतपन्न हुए । एकता के प्रयासों की इस असफलता की वासिहवक वयाखया यह है कि यह नहीं समझा जा सका कि हिनदुओं और मुसलमानों के बीचि जो कुछ है , उसमें आधयाशतमकता निहित है । यह उन कारणों से बना है , जिनका मूल-ऐतिहासिक , धार्मिक , सांसकृहिक और सामाजिक विरोध में है । राजनीतिक विरोध जिसकी एक छाया मात्र है और यह सभी मिलकर असंतोर् की एक गहरी नदी बनाते हैं ।
दलित-हिनदू एकता की बात करने वालों पर डॉ आंबेडकर का भरोसा नहीं था । उनका कहना था कि जिनको यही जानकारी नहीं हैं कि हिनदू और मुशसलम समाज के अंदर कटिुता और घृणा का आधार ्या है ? वह इस समसया का समाधान नहीं निकाल सकते हैं । हिनदू समाज उस मनोवृहत् का समाधान चिाहता है जो मोहिमद बिन कासिम , महमूद गजनी , गौरी से लेकर
अहमदशाह अ्दाली के समय तक हिनदुस्ान की हिनदू संसकृहि , हिनदू धर्म , मंदिरों , बौद्ध विहारों , हव्वहवद्ालयों को नष्ट करके हिनदुओं को तलवार की जोर पर मुसलमान बनाकर अपना वचि्यसव सिद्ध करके हिनदुओं को अपमानित करने में ही सुख का अनुभव करती थी । हिनदू- मुशसलम एकता की वकालत करने वालों ने न तो हिनदुओं के हृदय पर लगे घावों का अनुभव किया है और न ही पाशविक वृहत् के शमन का ही कोई योगय प्रयास किया । इन आरिमणकारियों द्ारा अपनाए गए तरीके अपने पीछे कटिुता की दूसरी फसल छोड़ गए । इसके कारण हिनदू और मुसलमानों में कटिुता इतनी बढ़ी कि विगत शता्दी का राजनीतिक जीवन इसे न तो शांत कर सका और न ही लोग इसे भूल सके । इन आरिमणों ने हिनदुओं के अनेक मंदिरों को नष्ट किया , बलपूर्वक हिनदुओं का धर्मपरिवर्तन कराया गया , उनकी संपहत् लूटिी गयी , उनिें गुलाम बनाया गया और बच्ों , युवा , वृद्ध नर-नारियों को अपमानित किया गया । डॉ आंबेडकर का हवचिार था कि मुशसलम और ईसाई हिनदुओं से
भिन्न हैं । उनकी हन्ठाएं संदेहासपद हैं , जबकि दलित समाज इसी रा्ट्र का अंग है । उनकी यह मानयिा अनेक बार सप्टि हुई ।
देखा जाये तो डॉ अंबडेकर के लिए दलित- मुशसलम एकता से कही जयादा जरुरी रा्ट्रीय एकता थी । उनिोंने हमेशा रा्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया और उनकी अटिूटि देशभक्ि प्रतयेक स्ान पर प्रकटि होती थी । देश का सववोच् हित ही उनका अभीष्ट था । उनका कहना था कि अपना रा्ट्र यदि संघर्षों , आरिमणों और युद्धों से दूर रहेगा तो तीव्र गति से उन्नति करेगा । इस प्रकार अगर देखा जाये तो डॉ आंबेडकर ने मुशसलमों की सोचि और उनकी नियत के बारे में विसिार से चिचिा्य की , उनिोंने कभी भी दलित- मुशसलम एकता के लिए न तो काम किया और न ही प्रयास किया । सप्टि मत था कि रा्ट्र क्याण और रा्ट्र हित ही सबसे पहले आता है और भारत के हित को देखते हुए दलित और मुशसलम समाज के बीचि किसी भी तरह की राजनितिक एकता भारत के लिए नया खतरा बन कर आएगी । �
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