eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 44

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वेद-पाठात् भवेत् विप्रः , ब्ह्म जानातीति ब्ाह्मणः |
अर्थात जनम से सभी शूद्र होते हैं , संसकारित होकर हद्ज बनते हैं , वेद पाठ कर विप्र बनते हैं और ब्ह्म को जानकर ब्ाह्मण बनते हैं ।
यह ्लोक सप्टि कर देता है कि कोई भी जनम से ब्ाह्मण नहीं है । ब्ाह्मण होना एक गुण है जिसे पुरुर्ार्थ से अर्जित करना पििा है । जिन ग्ं्ों में इतनी सुनदर बात कही गई हो वह किसी के साथ भेदभाव कर ही नहीं सकता । जाहिर है कि इनिें समझने में कहीं न कहीं चिूक हो रही है । समझने में हुई चिूक को इस ्लोक से समझते हैं : पृथिवयां यानी तीर्थानि तानी तीर्थानि सागरे । सागरे सर्वतीर्थानि पादे विप्रसय दहक्णे ।। अर्थात पृथवी में जितने भी तीर्थ हैं सब सागर
में भी हैं और सागर के सभी तीर्थ विप्र के दहक्ण
में कदम रखने में हैं अर्थात विप्र की सरलता में हैं अर्थात जब आप सरल हो जाते हैं तब सारे तीर्थ मिल जाते हैं ।
दहक्ण श्द के दो अर्थ हैं दहक्ण दिशा और दूसरा अर्थ है सरलता । इस बात की पुष्टि संसकृि श्दकोश से किया जा सकता है । इसका दूसरा प्रमाण यह है कि दहक्ण श्द का सपिमी एक वचिन रुप ‘ दहक्णे ’ का प्रयोग किया गया है – पादे विप्रसय दहक्णे । दहक्णे का अर्थ है दहक्ण में अर्थात सरलता में । यदि इसका अर्थ वासिव में दाएँ पैर में होता तो कर्मधारय समास का प्रयोग कर ‘ दहक्णपादे ’ श्द का प्रयोग होता न कि ‘ दहक्णे पादे ’। इसके अलावा पूर्वविजी ्लोक में हमने देखा विप्र और ब्ाह्मण दो अलग अलग अवस्ा है , विप्र का अर्थ ब्ाह्मण कदापि नहीं है । संसकारित होकर हद्ज बनते हैं और वेद पढ़कर विप्र बनते
हैं , ब्ह्म को जानकर ब्ाह्मण बनते हैं ।
अब जब दोनों ्लोकों को हम एक साथ विश्लेषण करते हैं तो इसका वासिहवक अर्थ कुछ इस तरह सप्टि होता है – वेद पढ़कर जो ज्ानी है वह विप्र है परंतु ज्ानी होकर वह सरल न होकर अहंकारी हो जाता है तो वह ब्ाह्मण नहीं हो सकता । ज्ानी जब अपने कदम सरलता की ओर उठाता है तब वह ब्ह्म को जान सकता है और ब्ाह्मण बनता है । यही इसका वासिहवक और सही अर्थ है । इन सबसे सप्टि है कि वर्ण वयवस्ा कभी भी जनम आधारित नहीं था । यह गुणों पर आधारित कर्म विभाजन पर आधारित था । और जब यह वयवस्ा अपने वासिहवक अ्षों के साथ लागू होगा तब न केवल छुआ- छूत की समसया का समाधान होगा वरन बेरोजगारी जैसी समसया का भी समाधान मिलेगा । �
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