पाया है : 1 . समसया के लक्ण जानना 2 . वासिहवक समसया को पिचिानना 3 . संभावित निदान की सूचिी तैयार करना 4 . सूचिीबद्ध निदानों में से एक-एक कर
आजमाना
अधिकांशतः समसया और समसया के लक्ण में वयश्ि भ्रमित हो जाता है और कई बार
लक्णों को समसया मान बैठता है । यदि आपने लक्ण को समसया मान बैठे तो यकीनन आप समसया के भंवरजाल में उलझ गए । अब समसया का निदान संभव नहीं है । लक्ण को समसया समझने पर आप केवल मरममि कर सकते हैं , समसया जस का तस रहेगा और अपना लक्ण पुनः प्रकटि करेगा । ऐसी अवांछनीय शस्हि से बचिने के लिए असली समसया को पिचिान कर ठीक करना आव्यक है । साधारण से उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं – यदि मोटिर का शाफ्ट टिूटि रहा है
तो शाफ्ट टिूटिना समसया नहीं है , यह लक्ण है । यदि शाफ्ट टिूटिने को समसया मान लिया गया तो इसको या तो बदल दिया जाएगा या मरममि कर लगा दिया जाएगा । निश्चित रुप से यह शाफ्ट दोबारा टिूटिेगा । असली समसया है संरेखण माने अलाइनमेंटि । अलाइनमेंटि जब तक ठीक नहीं किया जाएगा तब तक शाफ्ट टिूटििा रहेगा । और आसान श्दों में समझने का प्रयास करते हैं- सिर दर्द समसया नहीं है , यह लक्ण है । केवल सिर दर्द की और्हध आपको क्हणक राहत दे सकता है पर स्ाई समाधान नहीं । सिर दर्द का लक्ण किस समसया से आया यह जानना अति महतवपूर्ण है तभी स्ाई समाधान मिलेगा ।
सविंत्रता के बाद और पहले से भी अनेक समाजसेवियों ने असपृ्यिा को खतम करने के लिए आंदोलन किया । आंदोलन का मुखय निशाना वर्ण वयवस्ा रहा । पर आज भी यदि इह मसया की पुनरावृहत् हो रही है तो कहीं हम लक्ण को समसया मानने की भूल तो नहीं कर
रहे हैं । मेरा मानना छुआ-छूत लक्ण है और समसया कहीं और छुपा हुआ है । एकबारगी मैं अपने से पूर्व हुए हवचिारकों की बात को सही मान लेता हूँ कि वर्ण वयवस्ा ही छुआ-छूत की जि है तब शूद्र वर्ण में सभी के साथ छुआ-छूत होता । परंतु ऐसा नहीं है । सप्टि है कि वर्ण वयवस्ा का छुआ-छूत से कोई लेना देना नहीं है । जब तक लक्ण को समसया मान समाधान खोजा जाएगा तब तक समसया का हल मिलेगा नहीं ।
तब फिर इसका समाधान ्या है ? छुआ- छूत किसी भी शस्हि में सवीकार्य नहीं है । तब कैसे होगा समाधान ? समाधान वहीं मिलेगा जहाँ से इसकी उतपहत् माना जा रहा है । हमें अपने ग्ं्ों को गहराई से पढ़ना पिेगा और समझना पिेगा कि वासिहवक वर्ण वयवस्ा ्या है ? वर्ण को जाति श्द का पर्यायवाचिी समझना बहुत बिी गलती है । इसके अलावा इस ्लोक से समझने का प्रयास करते हैं :
जनमना जायते शूद्रः , संसकारात् भवेत् हद्जः |
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