से उनमें अपने अशसितव के संकटि को पिचिानने का सोचि-हवचिार पैदा होगा और उनमें असमानता को समूल नष्ट करने के संघर््य की चिेतना जागृत हो सकेगी ? इन सब बातों को महिला सशक्िकरण के संदर्भ में सोचिना-हवचिारना बहुत आव्यक है ।
सश्िीकरण के सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों से औपचिारिक शिक्ा , सवासथय सुविधाएं और साख व रोजगार के अवसर उपल्ध करवाना आव्यक है , परंतु इन अवसरों से लाभ उठाकर भी महिलाओं की शस्हि में परिवर्तन आए यह आव्यक नहीं है , इसलिए महिलाओं के आंतरिक सोचि में परिवर्तन लाने के लिए प्रचिार-प्रसार भी आव्यक है । आशतमकरूप से हनभजीक , बचिपन से ही शारीरिक रूप से शक्िशाली और आर्थिक रूप से सवावलंबी बनाना , महिला सश्िीकरण के चिरण हो सकते हैं । इसके साथ ही विधिक
साक्रता और सहायता से इस जागृति को सही दिशा में गति दी जा सकती है जिससे सूक्म से वृहद सिर तक हो रहे प्रतयेक प्रकार के अनयाय और अपराध का सश्ि विरोध महिलाएं कर सके । पुलिस , प्रशासन और विधि से जुड़े संपूर्णतंत्र को इस संबंध में संवेदनशील बनाना सार्वजनिक नीतियों की सववोच् प्राथमिकता होनी चिाहिए ।
एक दलित महिला की जिंदगी व सममान मानवाधिकारों पर बहुत निर्भर करता है । किंतु उनके मानवाधिकारों का बहुत ही वयवशस्ि तरीके से उ्लंघन देखने को मिलता है । बाल जनम व विवाह पंजीकरण दलित लड़कियों को यौन उतपीिन , तसकरी , बाल मजदूरी , जबरन व छोटिी उमर में शादी से संरक्ण प्रदान करता है , किंतु भारत में बाल जनम व विवाह पंजीकरण की अनिर्वायता के महतव को सिर्फ अदालतों ने ही समझा है । प्रशासन की लापरवाही व गैर संवदेनशीलता के कारण 46 प्रतिशत शिशुओं का जनम पंजीकरण नहीं हो पाता और इसमें दलित लड़कियों की संखया गौरतलब है । दलित महिलाओं के बच्ों को न तो गुणातमक शिक्ा
मुहैया कराई जा रही है । न ही ऐसी शिक्ा जिसे हासिल कर वे सश्ि बन सकें ।
दलित महिलाओं की इस हचिंतनीय शस्हि से जुड़े कारण भी बैचिेन करने वाले हैं । यह एक हकीकत है कि दलित महिलाओं के साथ सिर्फ ऊंचिी जाति के लोग ही भेदभाव नहीं करते बल्क अपने समुदाय के भीतर ही उनिें कमजोर बनाए रखने की हर संभव कोशिश की जाती है । दलित राजनीति में महिलाओं का वजूद सिर्फ संखया तक ही सीमित है । उधर महिला आंदोलन में भी दहेज हतया जैसी सामाजिक समसयाओं पर यादा फोकस किया गया । इस महिला आंदोलन में दलित महिलाओं की आवाज , उनके विद्रोह यादा नजर नहीं आते । इसके अलावा आम दलित महिलाओं को उनके पक् में बने कानूनों की जानकारी भी बहुत कम होती है । दलित महिलाओं को प्रताड़ित करने वाले मामलों में सिर्फ 1 फीसद अपराधियों को ही अदालत सजा सुनाती है । अदालतों में अपराधियों को सजा से मु्ि करना भी एक बहुत बड़ी समसया है जो पीड़ित दलित महिलाओं को सालती है । �
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