eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Seite 40

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के चिलते हुए कुछ आशाजनक शस्हि निर्मित हुई । साथ ही महिलाओं के पक् में किए गए कानूनी सुधारों ने भी महिलाओं की पैरवी की । लेकिन समितियों , रपटिों , योजनाओं और सुधारों से परे िटिकर यदि वासिहवकता देखी जाए तो महिलाओं की शस्हि में जितना सुधार इन प्रयासों से आना चिाहिए था , वह अब तक नहींआ पाया है । ्योंकि महिलाओं के लिए बने तमाम कानून , योजनाएं और नीतियां हमारी मानसिकता को बदल नहीं सकी हैं । इसके लिए प्रयास महिलाओं को ही करना होगा ।
दलित महिला के लिए पहली चिुनौती तो यही है कि बदलते परिवेश में सामाजिक मानयिाओं का सममान करते हुए वह समाज के दृष्टिकोण को बदल डाले कि सत्री ही सत्री की सबसे बड़ी शत्रु हैं । महिलाओं की समसयाओं के हल हेतु महिलाओं को ही आगे आकर महिलाओं को समझना पड़ेगा , यह भी एक
चिुनौती है पर सबसे बड़ी चिुनौती यही है कि महिलाएं अपने अनेक रूपों को ( बहन , बेटिी , पत्ी आदि ) सहज रूप में बनाए रखकर अपनी लड़ाई लड़ सकती है या नहीं , ्योंकि अति उच्छृखलता , अतिउनमुकता , अति परकीयकता भारतीय महिलाओं , भारतीय परिवेश और पारिवारिकता के विरुधद है । यदि रचिनातमक जीवन उसे जीना है और समाज में अपनी पिचिान बनानी है तो उसे पुरुर् समाज द्ारा खीचिी गई लक्मण रेखा को लांघना ही होगा और समाज में जो भी शस्हियां , चिुनौतियां आएंगी , उनका डटिकर मुकाबला करना होगा । कोई जरूरी नहीं यह लक्मण रेखा लांघने के बाद उसे सब कुछ आसानी से मिल जायेगा । जिनसे पाना है या जिनके बीचि से होकर गुजरना है वह आज जहां खड़ी है कही उससे अधिक भयानक शस्हियां उसके सामने आ सकती है , लेकिन इसी के बीचि से अपना सफर तय करना
और अपनी पिचिान भी बनानी है । ्या यह सतय नहीं है कि निर्धन-कमजोर-गरीब लोगों एवं सभी प्रकार की महिलाओं का विराटि जनता जनार्दन तो केवल उस ज्ान पर आश्रित रहा जो उसे वांछित परंपरा द्ारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलता रहा और शासत्र एवं साहितय शताब्दयों तक इस देश में राजा-महाराजाओं , सामंतो- उमरावों , धनवानों-उच् कुलीनों के प्राधिकार में रहे ?
महिला कामगारों में चिाहे घास काटिने वाली हों , तेंदूपत्े जमा करने वाली हो , बीड़ियां , अगरबत्ी आदि बनाने वाली हों , मिट्टी के बर्तन बनाने वाली हों , मछलियां ढ़ोने और बेचिने वाली हों या कपड़ा बुनने वाली हों इन सभी क्ेत्रों में उनिें पुरुर्ों से अधिक मेहनती काम करने के बाद भी उनसे कम मजदूरी मिलती है , उन महिलाओं को प्रसूतिकाल की मजदूरी नहीं मिलती , ्या महिला साक्रता अभियान
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