eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 38

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दलित महिलाओं के

मानवाधिकार

की चिंता क्यों नहीं ?

सभयिा के इतिहास में महिला अशसमिा , उसके समान अधिकार मानव

और सविंत्रता का प्रश्न सदा से ही उलझनपूर्ण रहा है । महिला को लेकर जितनी भी वयवस्ाएं बनी उनमें उसे प्राय : दोयम दजदे का स्ान ही दिया गया है । महिलाएं दलितों में भी दलित मानी गई है । इसके लिए हमारी सामाजिक वयवस्ा और पुरुर् प्रधान समाज की सोचि पूर्णत : उत्रदाई है । सामाजिक असमानता , निरक्रता , अंधहव्वास , दहेज , जाति-प्रथा , लिंग-भेद आदि मुद्ों के विरुधद आवाज उठती रही हैं और निरंतर उठ रही हैं । परंतु इन सब से पूरी तरह मुक्ि पाना अभी शेर् है । हमारे यहां महिलाओं के मनोवैज्ाहनक संसकार ही अधीनस्िा के हो जाते हैं । तयाग , सहि्णुिा और करुणा अतिवादी सवरुप धीरे- धीरे महिलाओं को भीरू , असहाय और पराजित बनाते चिले जाते हैं ।
भारतीय संविधान ने महिला व पुरुर् दोनों को समकक् रखकर उनके विकास के लिए समान अवसरों की गारंटिी दी । अनेक प्रावधानों द्ारा महिला को सुरक्ा तथा संरक्ण प्रदान करने की वयवस्ा की गई । पर इन सबके बावजूद महिला की शस्हि में गुणातमक
परिवर्तन नहीं आया , ्योंकि सामाजिक रवैए में बुनियादी बदलाव नहीं हुए । समाज ने महिला के प्रति अपने दायितव के निर्वहन में कोताही बरती । यही वजह है कि आए दिन महिलाओं और विशेर्कर पिछड़ी , दलित , दमित तबके की महिलाओं पर समाज अपना जु्म ढा रहा है । अपने ऊपर ढाए गए जु्म का विरोध करने वाली दलित महिलाओं को कभी जिंदा जला डालने , कभी अंग-भंग करने , कभी हनव्यसत्र कर गांव में घुमाने , कभी उनके परिजनों को बंधक बना लेने , तो कभी उन पर पाशविक , पैशाहचिक कृतय किए गए हैं । आश्चर्य यह कि दिन पर दिन ऐसी घटिनाएं बढ़ रही हैं और आर्थिक , वैज्ाहनक , सांसकृहिक रूप से सभयिा की पराका्ठा पर पहुंचिने का दावा करने वाले
भारतीय समाज को इन घटिनाओं से कोई फर्क नहींपड़ रहा है ।
दलित महिलाओं की शस्हि पर अ्सर मीडिया का धयान भी तब जाता है जब वे बलातकार की शिकार होती हैं या उनिें ननि , अर्धननि करके सड़कों पर घुमाया जाता है । ऐसी शर्मनाक घटिनाओं की रिर्पोटिंग के बाद उनका फॉलोअप बहुत ही कम किया जाता है । बात अकेले मीडिया की नहीं है , दरअसल सारा समाज ही इतना आतमकेशनद्रि हो गया है कि ऐसी घटिनाओं पर तब तक कोई हलचिल नहींमचििी , जब तक कि उनका संबंध सत्ा , प्रशासन या ऐसे ही किसी प्रभावशाली तबके को प्रभावित न करे ।
आजादी के छह दशक बाद भी दलित
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