अपने लिए धन की प्राशपि के एक अनय ज़रिए के रूप में वो लोग निसहाय अवणषों से कर वसूली भी करते थे । अपना खून ¬ पसीना एक करके सवणषों के लिए अन्न उतपन्न करने वाले निरीह अवणषों को लेकिन अपनी मेहनत के मेहनताना के रूप में घोर यातनाओं के अलावा कुछ भी नहीं मिलता था । असपृ्यिा और तिरसकार रूपी दो धारी तलवार उनके सिर पर हमेशा लटिकी रहती थी । अययन काली जानते थे कि सवणषों को अपने पिछले अनुभव
से यह सीख मिल चिुकी थी कि खेत ¬ खलिहान में मेहनत ¬ मजदूरी करने के लिए अवर्ण तैयार नहीं हुए तो उनके घरों में चिू्िे नहीं जलेंगे ।
खाने के लिए अन्न की कमी महसूस करके
प्रशासन ने मजबूरी में , समझौते के तौर पर दलित विद्ा्जी को विद्ालय में प्रवेश की अनुमति दे दी । इसके बावजूद सवाभाविक तौर पर दलित बच्ों को बाकी बच्ों के साथ बैठकर पढ़ने की अनुमति विद्ालय के सवर्ण अधिकारी नहीं दे रहे थे । परिणाम सवरूप अययनकाली अपने साथियों के साथ मिलकर पन्चमी नामक एक दलित बालिका को नेययाहट्टनकरा तालुका के ऊरूट्टमबलम में शस्ि बालिका विद्ालय ले गए और अनय
छात्राओं के साथ उसे भी बैठा दिया । एक दलित बालिका के सपश्य से विद्ालय अपवित्र हो गया कहकर सवणषों ने उस विद्ालय को भी जलाकर खाक कर दिया ।
इस घटिना के मद्ेनज़र अययन काली के
मन में दलित बालक ¬ बालिकाओं के लिए एक अलग विद्ालय आरंभ करने के हवचिार ने जनम लिया । उनिोंने इस संबनध में अंग्जी अधिकारियों से मुलाकात करके निवेदन दिए और फलसवरूप 1914 में उनके गांव के पुतुविलाकम में मलयालम विद्ालय आरंभ करने की अनुमति देते हुए सरकार ने उसकी वयवस्ा कर दी । 1905 में अययनकाली ने दलित बच्ों को अक्र ज्ान से अवगत कराने के लिए जिस ‘ कुड़िपल्ल्कुिम् ’ ( ऐसा विद्ालय जहां बच्ों को मात्र अक्रों के ज्ान कराए जाते हैं ) आरंभ किया था , उसे ही सरकारी विद्ालय के रूप में पदोन्नत किया गया था ।
तीस साल की उम् में दलितों की उन्नति के लिए संघर््य प्रारंभ करने वाले अययन काली दस साल तक संघर््य करते रहने के बाद मात्र 40 साल की उम् में ही यक्मा रोग से ग्सि हो गए । इसके बावजूद उनका संघर््य हब्कुल भी कम नहीं हुआ । अपने रोग की परवाह किए बिना वे लमबे 48 वर््य दलितों के लिए संघर््य करते रहे । इस रोग के चिलते 77 साल की उम् में उनकी सेहत इतनी बिगड़ गई कि 18 जून 1941 को दलितों के लिए रोग से संघर््य करते हुए वे इस दुनिया से अलविदा कह गए ।
उनकी समृहि में उनके जनम स्ल वेंगानूर में उनका समारक और उनके नाम से एक विद्ालय भी आज शस्ि हैं । केरल की राजधानी तिरूवननिपुरम के वे्लयमबलम चिौक पर नवमबर 1980 को उनकी एक आदमकद भवय मूर्ति की स्ापना की गई । हर वर््य 28 अगसि को ‘ अययन काली जयनिी ’ नाम से उनका जनमहदन मनाया जाता है । उनकी जयनिी के अवसर पर केरल में सार्वजनिक अवकाश रहता है । उनिें श्रद्धांजली अर्पित करते हुए भारत सरकार के डाक विभाग के द्ारा 12 सितमबर , 2002 को उनके नाम की डाक हटिकटि का विमोचिन किया गया । इन सब बातों से यह ज्ाि होता है कि जाति , धर्म और राजनीति से परे इन महातमा का नाम भारतवासियों के हृदय में हचिरस्ाई हैं । �
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