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आगे बढ़ते रहे । उनकी इस यात्रा से उत्ेहजि उनके अनुयायी एकजुटि होकर पैदल ही उनके साथ गाड़ी के पीछे ¬ पीछे बढ़ते रहे । इस घटिाना के बाद उनके अपने समुदाय के लोग उनिें ‘ अययन काली मालिक ’ कहकर संबोधित करने लगे । अययन काली अपने अकेले के दम पर बैल गाड़ी पर की यात्रा जारी रखी । धनाढ्य सवणषों ने अपने पाले हुए गुगषों की शारीरिक शक्ि के बल पर इसे रोकने के प्रयत् किए । उनके और उनके साथियों के साथ , सवणषों के गुगषों की टक्कर होती रही । इस संघर््य के चिलते दलितों ने राहों में अपने खून बहाए , इसके बावजूद अययनकाली अपनी जाति के लोगों के साथ अनय दलित जाति के लोगों के भी आराधय बन गए ।
अतयहधक साहस का प्रदर्शन करते हुए राहों पर सविनत्र सवारी करने का अधिकार प्रकटि करने के साथ गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई एक जन समूह को उससे मुक्ि दिलाने के लिए प्रयु्ि ‘ बैलगाड़ी ’ इतिहास में दर्ज इस प्रकार का पहला वाहन है । इस एक घटिना के साथ ही अययनकाली का नाम नवोत्ान संघर््य के नायकों में शुमार हो गया । केरल के दलितों की उन्नति के लिए आजीवन संघर््य करते रहने वाले महान समाज सुधारक होने के नाते महातमा गांधी ने अययन काली से मुलाकात करने पर उनिें ‘ पुलाया राजा ’ कहकर संबोधित किया था ।‘ मशनदर प्रवेश की उद्घोषणा ’ से संबशनधि 1937 में केरल के दौरे पर आए गांधी जी ने वेंगानूर जाकर उनसे मुलाकात की थी ।
1898 ¬ -99 के दौरान अययनकाली के नेतृतव में खेतिहर मज़दूरों ने हड़ताल कर दिए । इसके तहत दलितों ने मज़दूरों को मनु्य मानने से इनकार करने वाले धनाढ्यों के खोतों में मज़दूरी करनी बनद कर दी । इस पर सवणषों ने पहले तो सवयं खेती करने की कोशिश की , फिर जब उसका कोई अ्छा नतीजा नहीं निकला तो मज़दूरों से बदला लेने के सवरूप अपनी ज़मीनों को बिना खेती के बंजर छोड़ दिए । काम के बिना मज़दूरों की
जिनदगी अतयहधक कष्टदायक हो गई । इसके बावजूद हड़ताल से पीछे िटिने के लिए वे लोग तैयार नहीं हुए । आखिर में खाने के लिए अन्न की कमी महसूस करके सवणवो को अवणषों के सामने झुकना पड़ा । मजदूरों की करीब ¬ करीब सारी मांगों को मानकर 1905 में उनके हक में फैसला लिया गया । इस हड़ताल ने पूरे केरल में जोश की एक नई लहर दौड़ा दी और आगे चिलकर इसने खेतिहर मज़दूरों के हक की लड़ाई में ईंधन का काम किया ।
खेतीहर मजदूरों के संघर््य में प्रापि विजय से मिली ऊर्जा लिए अययन काली ने अवर्ण शसत्रयों के विरूद्ध सवणषों के अमानुहर्क संप्रदाय का विरोध करने का निश्चय किया । उनिोंने अपनी जाति की शसत्रयों से सिन ढ़कने के लिए पर्यापि वसत्र पहनने का आह्ान किया । इसके साथ ही उनिोंने गुलामी के चिन्ह् सवरूप गले में पहनी हुई ‘ पत्र की माला तथा कान में पहने हुए लोहे के छ्ले ’ उतारकर भेंकने के लिए भी कहा । असपृ्यिा की पैरवी करने वाले सवणषों ने इसे अवणषों के अहंकार का दर्जा देकर अययन काली की बात मानने वाली शसत्रयों को दंड़ दिए । शसत्रयॉं यदि सिनों को ढ़कते हुए वसत्र पहनी हुई हों तो सवर्ण उनके वसत्रों को फाड़ देते । जो कोई भी इसका विरोध करती , उसके सिनों को बेरहमी से काटि देते । उनके पिता और भाइयों के सामने ही रिूरता से उनकी हपटिाई करते । जब सवणषों की इस प्रकार की रिूरता पूर्वक प्रवृहत्यॉं हद पार कर
गई तब अवर्ण जनता ने उनका डटिकर मुकाबला किया । इस प्रकार तिरूवितॉंकूर के अनेक प्रदेश दंगाई क्ेत्रों में तबदील हो गए । जब दंगे ने भयानक रूप धारण कर लिए तब अययन काली के आह्ान पर दलित , को्लम नगर के ‘ तोप का मैदान ’ नामक मैदान में एकत्रित हुए । इस मैदान में आयोजित सममेलन के दौरान उनिोंने ‘ पत्र की माला और लोहे के छ्ले ’ उतार फेंकने का आह्ान किए और साथ में सवणषों से यह मांग भी की कि वह दलितों की जायज़ मांगों को अनसुनी न करें । उनकी बात सुनकर शसत्रयों ने अतयहधक जौश के साथ ‘ पत्र की माला और लोहे के छ्ले ’ उतारकर फेंक दिए । इसके तहत यह संघर््य ‘ पत्र की माला संघर््य ‘ के नाम से इतिहास में दर्ज हैं ।
अययनकाली ने 1904 में अपने ही गांव वेंगानूर में अपने साथियों के साथ मिलकर दलितों के लिए एक विद्ालय आरंभ किया , लेकिन सवणवो ने उसी रात को उसे जलाकर खाक कर दिया । इसके विरोध सवरूप भी अययन काली के आह्ान पर दलितों ने सवणषों के लिए खेतों में मजदूरी करना बनद करके हड़ताल का ऐलान कर दिया । अवणषों को भी सवणषों की तरह विद्ालय से विद्ा आर्जित करने की अनुमति प्रदान कराना ही इस हड़ताल का लक्य था । अवणषों को अछूत मानते हुए उनकी परछाई से भी दूर रहने वाले सवर्ण लेकिन उनिीं से अपने खेत ¬ खलिहाानें में मेहनत ¬ मजदूरी कराते थे । इसके अलावा
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