eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 35

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के रल के महान दलित नायक ‘ अय्यन काली ’

बाबू राज के नायर

लितों के उद्धार की बात

आते ही केरल के एक
महान समाज सुधारक की याद ताजा हो आती हैं । असपृ्य मानकर समाज से बहि्कृि दलितों के उत्ान के लिए अपना जीवन समर्पित कर देने वाले वो महातमा हैं अययन काली । उनके जनम के समय केरल मलबार , कोच्ी एवं तिरूवितॉंकूर के नाम से तीन भागों में बँटिा हुआ था । मलबार पर अंग्ेजी हुकूमत चिलती थी तो तिरूवितॉंकूर तथा कोच्ी अंग्ेजों के नियनत्रण वाले राज शासन के अधीन थे । समपूण्य भारत में सदियों से चिातुर्वण वयवस्ा कायम थी , लेकिन केरल में ‘ सवर्ण-अवर्ण ’ नाम से बंटिे हुए समाज की जाति वयवस्ा उससे भी कईं अधिक बुरी थी । केरल में ब्ाह्यण एवं क्त्रीय ( नायर ) सवर्ण तथा वै्य एवं शूद्र अवर्ण कहलाए जाते थे ।
तिरूवितॉंकूर के वेंगानूर गॉंव में पलावत्रा घर में अययन और मााला के पुत्र के रूप में 28 अगसि 1863 को केरल के महान दलित नायक अययन काली का जनम हुआ था । उनके जनम के समय हिनदुओं के बीचि की जाति वयवस्ा इस कदर बुरी थी कि असपृ्यिा का प्रचिलन अपनी चिरम सीमा पर था । समाज जातिवाद से कलुहर्ि था । दलित जाति ‘ पुलायर ’ जिसमें अययन काली का जनम हुआ
था , के साथ ‘ परायर ’, ‘ कुरावर ’, ‘ म्णान ’ जैसे कईं अनय शूद्र जातियों को भी ‘ अवर्ण ’ व ‘ असपृ्य ’ घोहर्ि करके अपने आप को सवर्ण जाति के मानने वाले समाज के धनाढ्य लोगों ने उनिें उनके सामाजिक अधिकारों से वंहचिि कर रखा था ।
जाति के नाम के इस भेदभाव को हमटिाकर सामाजिक अधिकारों से वंहचिि जन समूह को उनका हक दिलाने के लिए अययन काली ने सवणषों के विरूद्ध अपना मोचिा्य संभाला । जाति के परे सभी मनु्यों के साथ मनु्यिा के साथ
वयवहार कराना , विद्ाज्यन के माधयम से दलितों को अनय जनसमूह के साथ सामूहिक सविनत्रता प्रापि कराना आदि उनकी लड़ाई के अहम मुद्े थे । अययन काली को अपने बचिपन से ही , जातिवाद के तहत वयापि असपृ्यिा के चिलते जो सामूहिक भेदभाव सबसे अधिक खटिकता था , वह था ¬ राहों पर चिलने की असविनत्रता । आम राहों से होकर सवणषों के आने की सूचिना मिलते ही अवणषों को वहॉं से िटिकर उनके लिए निश्चित की गई दूरी पर जाकर छिपकर खड़ा होना पड़ता था ।
अययनकाली ने इस सामूहिक भेदभाव को हमटिाकर दलितों को राहों पर चिलने की सविनत्रता प्रापि कराने के लिए संघर््य करने का फैसला किया । उनिोंने सबसे पहले सन् 1893 में सवणषों के अहंकार एवं गर्व का उनिीं की रीति से सामना करने के लिए एक बैल गाड़ी खरीदी । धोती बांधकर , कुर्ता पहनकर तथा सिर पर पगड़ी बांधकर वह गाड़ी में सवार हो गए और अतयहधक साहस का प्रदर्शन करते हुए दलितों के लिए हनहर्द्ध राहों पर गाड़ी बढ़ाई । सवणषों ने उनकी राह रोकने की कोशिश की तो उनिोंने खंजर निकालकर उन लोगों को ललकारा , लेकिन किसी में भी उनका सामना करने की हिममि नहीं थी । बिना किसी डर के रोकटिोक के वो
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