eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 34

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दलित राजनीति में शक्ि संचिय एक सफलता अव्य है , पर उसकी कोई दिशा नहीं है । सामयवादी या समाजवादी रिांहि की शैली से प्रभावित सिद्धांतकारों ने दलित राजनीति को शक्िशाली बनाने में अव्य सकारातमक भूमिका निभाई है , पर उसका बार-बार दुरुपयोग भी किया है । यह दुरुपयोग वैसा ही है जैसा मुसलिम वोटि बैंक के साथ होता आया है । खुद दलित नेताओं में एक वयापक दिशाहीनता बनी हुई है । यह पूरे भारतीय इतिहास में एक र्ड्ंत्र की तरह फैला हुआ है और इसके परिणाम हर काल में एक जैसे रहे हैं । जब भी दलित और वंहचिि समाज अपने सांसकृहिक मू्यों को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ता है , राजनीतिक शक्ि के उपासक इसे शक्ि के गणित में उपयोग करके नष्ट करते रहे हैं । इसका परिणाम यह हुआ है कि एक अंधी और बहरी राजनीतिक शक्ि का जवार तो पैदा हो गया है , लेकिन आंख और कान वाली दलित संसकृहि का विकास नहीं हो पाया है ।
जब तक दलित समाज अपने पूर्वजों , संतों और अपनी विरासत पर गर्व करना नहीं सीखता तब तक उसका वर्तमान और भहव्य खुद उसकी नजरों में निंदित रहेंगे । दूसरी जातियों और समाज का उनके बारे में ्या मत है , वह भी दलितों की इस आतमिीनता की भावना से उपजता है । अगर दलित समाज और वयश्ि खुद को असंसकृि , असभय और पिछड़ा मानता है तो सवर्ण समाज भी उसकी आंखों में इस हीनभावना को पढ़ कर उसी भार्ा में उत्र देने लगता है । यही एक अर्थ में पूरे दलित समाज के पतन और दलन का मूल कारण है ।
इतिहास साक्ी है कि शत्रु के शौर्य-कौशल से नहीं , बल्क हितैहर्यों की मूर्खता से सभी साम्ाजय ढहाए गए हैं । और यह मूर्खता अगर र्ड्ंत्रपूर्वक पैदा की गई हो तब तो इससे जितनी ज्दी बचि निकलें उतना ही श्रेयसकर है । इसीलिए आज के समय में हमारे सामने चिल रहे राजनीतिक र्ड्ंत्रों से बचि कर दलित समाज के सांसकृहिक पुनर्गठन की आव्यकता
है । सभी दलित जातियों में संतों का एक विराटि साहितय है , जिसे प्राचिीन और मधयकालीन इतिहास से सीधे उठाया जा सकता है । उसमें संतुलित और सदाचिारी जीवन के सूत्र बहुत विसिार से समझाए गए हैं । ज्ान प्रापि करने और हलाल की कमाई से परिवार का पोर्ण करने सहित बच्ों और औरतों का नयायपूर्ण पालन-पोर्ण करने की बातें समझाई गई हैं । अंधहव्वासों को तोड़ने और कुरीतियों से लड़ने की सीख हर संत के साहितय में बहुत सरल भार्ा में दी गई है । इन संतों को एक माला में पिरो दिया जाए तो भारतीय दलितों के सांसकृहिक एकीकरण का प्रश्न बहुत आसानी से हल हो सकता है । उनमें शिक्ा और सदाचिार को आसानी से स्ाहपि किया जा सकता है । इसी रिम में एक सबल संसकृहि के निर्माण का लक्य भी हासिल किया जा सकता है । फिर दलित वोटि बैंक को मुसलिम वोटि बैंक की तरह खिलौना बनाने से भी बचिाया जा सकता है । �
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