eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 33

ऐसा भी बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि इनकी शस्हि में सुधार नहीं हुआ है । हुआ है पर अभी बहुत कुछ करना बाकी है । पर शायद हमारे नेता जिनकी राजनीति इनिी से चिलती है , पूरा प्रयास नहीं करते । आधुनिक समय में इसके कई नेता पैदा हो गए जिनमे कांशीराम , मायावती , उदित राज , रामविलास पासवान , जीतन राम मांझी , लालू यादव आदि प्रमुख हैं । इन लोगों की राजनीति इनिी के बलबूते चिलती है और इनके ही कनधों पर सवार होकर यह सत्ा सुख भोगते हैं ।
वैसे तो कहते हैं , यह शरीर भी चिार वणषों में बंटिा है सिर यानी दिमाग मशसि्क , ब्ाह्मण है तो भुजाएं क्हत्रय । कंधे से लेकर कमर तक वै्य है तो कमर के नीचिे का हिससा शूद्र है । फिर ्या बिना पैरों के हम खड़े हो सकते हैं ?
अर्थात शरीर के हर हिससे का अपना अलग महतव है । उसी प्रकार समाज के विभिन्न वगषों का अपना अलग महतव है । इसलिए इसे अलग-थलग नहीं किया जा सकता । समरसता , समभाव , समुहचिि भागीदारी जरूरी है तभी बनेगा समपूण्य समृद्ध भारत । दलित अशसमिा और सश्िीकरण के इस प्रश्न को भारतीय सामूहिक मनोविज्ान की पैनी नजर से देखने- समझने की जरूरत है । अ्सर हम समाजशासत्रीय या राजनीतिक नजरिए से अतयहधक प्रभावित रहते हैं और आम भारतीय के मनोविज्ान को नजरंदाज करते हैं । यह एक अपराध है । इसके मूल में अनय हवचिारधाराओं का र्ड्ंत्र भी काम करता रहा है ।
जो हवचिारधाराएं धर्म की सत्ा और आशसिकता की शक्ि को समापि करके किसी
तरह का का्पहनक यूटिोपिया लाने की तैयारी में हैं , उनिोंने पूरे दलित आंदोलन को गलत ढंग से इसिेमाल किया है । उनिोंने पूरे दलित समाज में नाशसिकता फैलाने और अपने-अपने सांसकृहिक मू्यों से घृणा सिखाने , अपने राजनीतिक लाभ के लिए भोलेभाले दलितों को उनकी संसकृहि और विरासत से दूर करने का कार्य किया है । वह दलित समाज को कमजोर करने का ही एक र्ड्ंत्र है । इससे बहुत तरह के नुकसान हुए हैं । दलित सश्िीकरण की संभावना पर कुठाराघात हुआ है । सामयवादी और समाजवादी राजनीतिक दीवानों ने दलित समाज में रिांहि की जैसी इबारत लिखी है , वह दलितों को और अधिक कमजोर और दिशाहीन करती जा रही है । एक राजनीतिक शक्ि , जो दलितों के संगठन से पैदा हुई है , उसकी आंखें और कान इन नाशसिकतावादी आंदोलनकारियों और लोकलुभावन राजनेताओं ने बहुत पहले नोंचि लिए ।
ऐसा मानने के कुछ आधारभूत कारण हैं । उनिें भारत में घहटिि हुए अनय सामाजिक आंदोलनों की सफलता या विफलता की तुलना करके समझा जा सकता है । इसके लिए भारत में धर्म और परंपरा की शक्ि को समझने का रुझान चिाहिए , जो कि अ्सर उच् हशहक्ि वर्ग में नहीं होता । विशेर् रूप से वह वर्ग , जो समाज विज्ान की पढ़ाई करता है । उसमें तो धर्म और परंपरा के प्रति निंदा का भाव इतने गहरे बैठ जाता है कि वह इसका कोई सकारातमक उपयोग देख ही नहीं पाता । उसके लिए परंपरा या धर्म का मतलब एक लाइलाज बीमारी की तरह होता है । मगर वह भूल जाते हैं कि वह भारत में बैठे हैं और जिस समाज को विकसित करना चिाहते हैं वह मौलिक रूप से धर्म और परंपराओं में जीने वाला समाज है । आज तक इतने दशकों या पूरी एक शता्दी में भी धर्म की पकड़ न तो सवर्ण समाज में कम हुई है , न ही दलित समाज में । कोई भी सामाजिक कार्य , जैसे-जनम से लेकर , शादी समारोह और अंतिम संसकार तक में सभी जातियों की भागीदारी बनी हुई है । यही है हमारे समाज का वासिहवक रूप ।
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