eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 32

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दलित चेतना और राजनीति

जवाहर लाल सिंह

ज भी देश में दलितों , निम्न

जाति के लोगों के साथ भेद-
भाव होता रहा है । इनके रहने का इलाका गांव या शहर से बाहर होता है । यह जयादातर मजदूरी और छोटिे-मोटिे काम- जैसे जानवरों की खाल उतारना , या उनके शवों को ठिकाने लगाने आदि का काम करते हैं । जूते सिलाई करने का काम भी यही लोग करते हैं , जिनिें चिमार जाति कहा जाता है । कुछ दलित वर्ग जिनमे वा्मीहक समाज प्रमुख है , आज भी मैला ढोने अथवा सफाई करने का काम करते हैं । कुछ जातियां जिनमे डोम प्रमुख हैं , मुददे को अहनि संसकार करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं . और भी बहुत सारी दलित जातियां
हैं , जिनके साथ सामाजिक भेद-भाव होता रहा है । बाबा भीम राव आंबेडकर भी दलित जाति के थे । उनिें भी तिरसकार झेलना पड़ा था और अंत में हिनदू धर्म की इस विद्रूपता से तंग आकर उनिोंने बौद्ध धर्म सवीकार कर लिया था । तिरसकृि होते हुए भी उनिोंने विदेश में पढाई कर उच् शिक्ा प्रापि किया और भारतीय संविधान के निर्माता बने और सामाजिक रूप से पिछड़े जातियों के लिए आरक्ण की वयवस्ा की जो आज भी लागू है । समय-समय पर इसमें संशोधन की बात उठती रही है , पर साथ ही साथ इनके साथ अनयाय भी होता रहा है । तभी तो सवर्ण और दलित में भेद-भाव बना हुआ ह । बीचि-बीचि में इसमें हवा दी जाती रही है और दोनों वगषों के बीचि हमटििी दूरी को फिर से
बढ़ाने का भी उपरिम होता रहा है ।
जगजीवन राम कांग्ेस के बड़े नेता थे । वह दलित जाति से आते थे । कहा जाता है कि वह काशी में किसी में मंदिर में गए थे तो उस मंदिर को गंगाजल से धोया गया । अभी हाल ही में जीतन राम मांझी ने भी अपने बारे में ऐसा ही कहा था । मतलब कुछ लोग आज भी भेदभाव जारी र्खे हुए हैं । आज भी कहीं-कहीं इनिें मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता । इन सबको इनके नेता भुनाते हैं और कुछ नए नारे गढ़ लिए जाते हैं , जैसे तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चिार । यानी खाई को चिौड़ी करने की प्रहरिया । भोले-भाले दलित इनके पीछे पीछे चिल पड़ते हैं और बन जाते हैं किसी खास पार्टी के वोटि बैंक ।
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