eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 31

दिया गया कि वनवासियों को हिंदू और ईसाई खेमों में खींचिने के प्रयास बंद हों और उनिें अपनी पिचिान सवयं निश्चित करने दी जाए , लेकिन दिलचिसप बात यह है कि इस पूरी कवायद में कैथोलिक चिचि्य बढ़-चिढ़कर हिससा ले रहा है । रांचिी के आचि्यहबशप फीहल्स टिोपपो ने मुखयमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर वनवासियों की भार्ाई , सांसकृहिक और धार्मिक पिचिान बनाए रखने के लिए सरना कोड पास कर केंद्र सरकार को भेजने की मांग की थी । कैथोलिक बिशपस के एक समूह ने तो राजय सरकार से यह मांग भी की है कि यदि केंद्र सरकार 2021 की जनगणना से पहले सरना धर्म कोड को मानयिा नहीं देती तो राजय में रा्ट्रीय जनसंखया रजिस्टर पर काम रोक दिया जाए । पूरी प्रहरिया में कैथोलिक चिचि्य की सरगमजी जताती है कि सरना धर्म कोड की मांग उतनी सीधी नहीं है , जितनी बताई जा रही है । वनवासियों को हिंदू समाज से तोड़ने का लाभ अंततोगतवा ईसाई मिशनरियों को ही मिलने वाला है ।
दरअसल जिस सरना धर्म के लिए अलग से जनसांशखयकी प्रावधान की मांग की जा रही है , न तो उसकी ऐतिहासिक पृ्ठभूमि है और न ही ‘ सरना ’ श्द का जनजातीय श्दावली में कहीं उ्लेख है । जिस ‘ सरना ’ श्द का प्रचिलन केवल रांचिी के आसपास के चिार-पांचि जिलों तक सीमित है , उसका आशय भी धार्मिक मानयिाओं से नहीं , बल्क उन पवित्र साल या महुआ वृक्वाहटिकाओं से है जिनिें वनवासी पूजयनीय मानते हैं , परंतु इन सरना स्लों की पूजा जनजातीय एवं गैर जनजातीय दोनों ही लोग समान रूप से करते हैं ।
पूजा के दौरान विशेर् दिनों में अहनि प्रजवहलि न करना , बोंगा पूजा , पितरों का अनु्ठान एवं पशुधन पूजा आदि का अनुसरण गैर जनजातीय भी उसी श्रद्धा भाव से करते हैं । वनवासियों में जनम से लेकर मृतयु तक तमाम जनजातीय संसकार एंव रीति-रिवाज हिंदुओं की ही भांति हैं । सिंदूर की रसम , बलि , पूजा के बाद प्रसाद वितरण , अशस् विसर्जन , जनम तथा
मृतयु के बाद अशौचि की क्पना , व्रत , मृतयु उपरांत भोज , श्राद्ध , धरती मां की क्पना , जनम के बाद छठी मनाना एवं माघ पर्व ऐसी तमाम बातें हैं , जो जनजातीय बंधुओं के वृहत हिंदू समाज से जुड़ाव को दर्शाती हैं । गैर जनजातीय हिंदुओं की तरह जनजातीय समूहों में भी गोत्रों का विशेर् महतव है और सवगोत्रों में विवाह पूर्णत : हनहर्द्ध होते हैं । जनजातीय लोग बड़े सिर पर न सिर्फ शिव , पार्वती और दुर्गा की पूजा करते हैं , बल्क उनके नामकरण भी हिंदू देवीदेवताओं के नामों पर होते हैं । सवयं मुखयमंत्री हेमंत सोरेन के पिता का नाम शिबु यानी शिव पर है तो उनके दिवंगत बड़े भाई का नाम दुर्गा सोरेन था । दुर्गा सोरेन की पत्ी का नाम सीता सोरेन है , जो अभी जामा से विधायक हैं ।
छत्ीसगढ़ के वनवासियों में तो रामायणी और पांडविनी के माधयम से रामायण और महाभारत की कथाओं का प्रसार भी होता है । झारखंड में ऐसे कई मंदिर हैं , जिनमें सर्वसमाज पूजा के लिए आता है , परंतु पुजारी वनवासी समुदाय से आते हैं । रांचिी के प्रसिद्ध देवरी मंदिर के पुजारी मुंडा जनजाति से और प्राचिीन टिांगीनाथ धाम के पुजारी बैगा जनजाति से आते हैं । इसी प्रकार गुमला के अंजनी धाम के पुजारी उरांव जनजाति से आते हैं । इसी प्रकार झारखंड में कई स्ानों पर सर्व समाज राधा-कृ्ण लीला के रास मेले भी आयोजित करता है । यह हासयासपद है कि इतने घुले-मिले समाज की रीति , परंपराओं और पिचिान की लड़ाई लड़ने का दम वे ईसाई संथाल कर रहे हैं जो सवयं
जनजातीय जीवनशैली से पूरी तरह कटि चिुके हैं ।
प्रकृति पूजा और जीवातमवाद का पुटि हिंदू धर्म में इतना गहरा है कि अंग्ेजी शासन में भी वनवासियों के लिए जनगणना में अलग प्रावधान के बावजूद ततकालीन अधिकारियों ने बार-बार माना कि यह भेद कृत्रिम एवं अवयावहारिक है । हिंदू मूलत : प्रकृति पूजक हैं और इस नाते जनजातीय जीवातमवाद और हिंदू धर्म में कोई सप्टि भेद नहीं किया जा सकता । साफ है यथार्थ से परे और अवयावहारिक सरना धर्म कोड की मांग वनवासी हित में कम , समाज में टिकराव और जनजातीय वर्ग को मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद करने का प्रयास अधिक नजर आती है । जनजातीय मामलों के जानकार इस हवर्य को पंचिायत ( अनुसूहचिि क्ेत्रों में विसिार ) अधिनियम यानी पेसा एक्ट-1996 के अंतर्गत पांचिवीं अनुसूचिी में देय प्रावधानों से जोड़कर भी देखते हैं । फिलहाल इन प्रावधानों के अंतर्गत आरहक्ि एकल पदों का लाभ केवल रूढ़ि और परंपरा से परिभाहर्ि जनजातियां ही ले सकती हैं , परंतु सरना धर्म कोड आने के बाद परिभार्ा लचिीली हो जाएगी और धमाांतरित ईसाई भी इसका लाभ ले सकेंगे । हालांकि कुछ एक जनजातीय मंचिों ने इस बिल का विरोध भी शुरू कर दिया है , पर यह मांग आने वाले समय में ्या रूप लेगी यह भहव्य ही बताएगा ? इतना जरूर तय है कि जब तक हिंदू समाज जाति भेदों को हमटिाने की दिशा में सहरियता नहीं दिखाएगा , ऐसी चिुनौतियां उसके समक् आती रहेंगी ।
( साभार ) fnlEcj 2020 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 31