eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 28

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तमिलनाडु में आतमसममान और काली कमीज आनदोलन चिलाने वाले पेरियार ई . वी . रामसवामी नायकर , साहितय के क्ेत्र में सहरिय रहे । पेरियार रामासवामी नायकर के आनदोलन को उत्र भारत में चिलाने के श्रेय ललई सिंह यादव को हैं । ललई सिंह यादव के बाद आदि हिनदू आनदोलन का नारा देने वाले सवामी अछूताननद ने साहितय सृजन के द्ारा दलित समाज में रिाशनि चिेतना प्रवाहित करने में महतवपूर्ण भूमिका निभायी । उनिोंने दलित समाज में जागृति के लिए दलित महापुरुर्ों को अपने साहितय का हवर्य बनाया । दलितों को इस देश का मूल निवासी सिद्ध करते हुए उनिें आदि- हिनदू नाम दिया ।
अतः बौद्ध धर्म के उदय से लेकर सवामी अछूताननद तक साहितय में दलित दृष्टि को
स्ान अव्य मिला है परनिु सीमित अ्वो में । आज का दलित हवर्यक साहितय जिस समग्िा से विकसित हुआ है उसमें इस साहितय का योगदान महतवपूर्ण है । अतः इन साहितयकारों की रचिनाओं में दलित हवर्यक साहितय की नींव खड़ी करने में महतवपूर्ण भूमिका निभाई है । जिसे भारत रत् डॉ . भीमराव आंबेडकर के उदय ने दलित दर्शन के रूप में परिवर्तित कर दिया ।
डॉ . आंबेडकर अपनी पुसिकें अपनी संतान से भी बढ़कर प्रिय हैं । वह कहते हैं , “ पुसिकें लिखते हुए समय कैसे बीता जाता है , यह मेरी समझ में नहीं आता । लेखन करते समय मेरी पूरी शक्ि एकत्रित होती है । मैं भोजन की परवाह नहीं करता मैं कभी-कभी तो रात भर पढ़ता लिखता बैठा रहता हूँ । मैं उस समय
कभी नहीं ऊबता , न ही मैं बहुत निरूतसािी और असंतुष्ट हो जाता हूँ , मेरे चिार पुत्र होने पर जितना आनंद होता , उतना मुझे मेरी पुसिक के प्रसिद्ध होने पर होता है ।“ बाबा साहब और पुसिकों का रर्िा कितना अटिूटि और प्रियकर है यह उपरो्ि कथन से सप्टि हो जाता है । बाबा साहब के पुसिक प्रेम उनकी साहितय से मानवतावादी हवचिारों की अपेक्ा तथा लेखक की आम आदमी के प्रति हवचिार की धारणा , कितनी यथार्थवादी ओर जीवोनमुखी है यह दिखाई देती है ।”
डॉ . आंबेडकर का कहना है कि आम आदमी की महत्ा से प्रेरणा लेकर लेखकों को लेखन करना चिाहिए । वह कहते हैं , ‘ अपनी साहितय की रचिनाओं में उदात् जीवन मू्यों और सांसकृहिक मू्यों को परर्कृि कीजिए । अपना लक्य सीमित मत रखिए । अपनी कलम की रोशनी को इस तरह से परिवर्तित कीजिए कि गांव , देहातों का अंधेरा दूर हो । यह मत भूलिए कि अपने देश में दलितों और उपेहक्िों की दूनिया बहुत बड़ी है । उसकी पीड़ा और वय्ा को भली-भांति जान लीजिए और अपने साहितय द्ारा उनके जीवन को उन्नत करने का प्रयास कीजिए । उसमें सच्ी मानवता निहित है । बाबा साहब का साहिशतयक हवचिार मानवतावाद पर आधारित है ।’
वर्तमान समय में दुनिया का अधिकांश सव्यश्रे्ठ साहितय आजादी की चिाह के लिए ही लिखा जाता है । अगर हम भारतीय संदर्भ में बात करे तो यहां के दलित हवर्यक साहितय में भी सदियों से प्रताड़ित , शोहर्ि , दमित , पराजित दलितों की आवाज और आकांक्ा वय्ि होती है । दलित हवर्यक साहितय में सामाजिक ऐतिहासिक , अनुभवों की गहरी अभिवयश्ि और मानव जीवन की दशाओं के बारे में अपनी अलग अंतर्दृष्टि है । इसमें विरोध एवं आरिोश का सवर है । इसमें ब्ाह्मणवादी वयवस्ा से पीड़ित और प्रताड़ित वयश्ि की आवाज सुनाई देती है , इसमें वयवस्ा से आजादी या सविनत्रता के साथ समता और बंधुतव की भावनओं की गहरी अभिवयश्ि
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