eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 27

जैसे श्दों का प्रयोग मिलता था । ऐसे श्दों के माधयम से दलितों की पिचिान होती थी ्योंकि भारत की चिातुव्य्य वयवस्ा में प्राचिीन प्रजातियों को शूद्रों की श्रेणी में रखा जाता था । समाज में बहि्कृि शूद्रों को सपश्य करने से वयश्ि अपवित्र हो जाता था । इस मानयिा के आधार पर शूद्रों को ‘ असपृ्य ’ कह कर पुकारा जाने लगा था जिसे आज भारतीय संविधान में ‘ अनुसूहचिि जाति ’ कह कर पुकारा जाता है ।
साहिशतयक दृष्टि से देखें तो हिनदी साहितय का अधययन भारतीचि एवं पाश्चातय साहितय- सिद्धानिों के आधार पर हुआ है । इस साहितय परमपरा में दलित दृष्टि को कोई स्ान प्रापि नहीं हुआ है । यत्र-तत्र हिनदी साहितय में शूद्रों की दीन-हीन दशा एवं छुआछूत का वर्णन अव्य हुआ है । परनिु आज पारमपरिक साहितय शासत्र से अलग िटिकर दलित हवर्यक सैद्धाशनिकी का सवरूप विकसित हो रहा है । भारतीय साहितय में दलित हवर्यक सैद्धाशनिकी का प्रथम सवरूप बौद्ध साहितय में सप्टि होता है । बौद्ध साहितय में सामाजिक समरसता एवं दलित रिाशनि का दर्शन दृष्टिगोचिर होता है । महातमा बुद्ध हव्व के प्रथम महापुरुर् थे जिनिोंने उद्घोष किया था । ‘ अनि दीपो भव , अनि नाथो भव ’ अर्थात अपना दीपक सवयं बनो । यह वा्य दलित हवर्यक साहितय का सिद्धानि बनकर सामने आया । पालि साहितय में 51 विभुओं , 15 भिक्ुहणयों , 18 उपासकों , 6 उपासिकाओं सहित 90 दलितों का उ्लेख मिलता है , जिनिोंने बौद्ध धर्म में उच् स्ान प्रापि किया था । आगे चिलकर बौद्ध धर्म की शाखाओं से सिद्ों और नाथों की परमपरा का जनम हुआ । हिनदी साहितय में परमपरा का जनम हुआ ।
हिनदी साहितय में 84 सिद्धों और 9 नाथ कवियों का उ्लेख मिलता है । इनमें दलित कवियों की संखया पर्यापि मात्रा में देखने को मिलती है । इन कवियों ने जन भार्ा अपभ्रंश में सामाजिक समरसता के हवचिारों को अभिवयश्ि दी । आगे चिलकर महारा्ट्र में नाथ सिद्धों की शाखा से वारकरी समप्रदाय उतपन्न
हुआ । इस समप्रदाय में संत नामदेव , संत एकनाथ , संत तुकराम ने हिनदी में रचिनाएं की है । इनकी परमपरा को आगे बढ़ाते हुए तेरहवीं- चिौदहवीं सदी में संत कावय धारा का जनम हुआ । संत कावय परमपरा में कबीर , रविदास , गुरु नानक , दादू दयाल , पलटिूदास , मलूकदास , सुनदरलाल , रजिन आदि संत है । इनमें अधिकांश संत निम्न कही जाने वाली जातियों से हैं । इन संत कवियों ने अपने साहितय में वर्ण-वयवस्ा , मूर्ति-पूजा , अवतारवाद , आडमबरों का विरोध किया है । इस धारा ने निराकार ब्ह्म की स्ापना कर सामाजिक समरसता के साहितय की रचिना की ।
संत साहितय परमपरा की लगभग दो शताब्दयों पश्चात साहितय की दलित धारा भारत की लगभग सभी भार्ाओं में पुनः उभरती दिखायी देती है । इसका कारण था कि भारत में अंग्ेजी राज के स्ाहपि हो जाने एवं ईसाई
मिशनरियों द्ारा अछूतों में शिक्ा का प्रचिार एवं प्रसार हुआ । इस नवजागरण काल में प्रायः सभी भार्ाओं में दलित रचिनाकार हुए जिनिोंने साहितय की रचिना की । साहितय की इस दलित धारा में महातमा जयोहिबा फुले का नाम अग्णी है । जयोहिबा फुले ने निबनध , संवाद पत्र , वैचिारिक लेखन , कावय रचिना इतयाहद विधाओं में अपने साहितय को लिखा है । सामाजिक कुरीतियाँ , नारी शिक्ा , समानता उनके साहितय का मुखय हवर्य है । इसी रिम में केरल में जाति से मछुआरे अछूत कवि के . पी . करुपन हुए , जिनिोंने सन 1913 में शंकराचिार्य के अद्ैि दर्शन का नया विनयास करते हुए ‘ जाति कुमभी ’ नाम से कविता लिखी । केरल के दलित हवर्यक साहितय की पृ्ठभूमि में नारायण गुरु का आनदोलन है । नारायण गुरु के हश्य थे कुमारान आशान जिनिोंने अपनी रचिनाओं के माधयम से जाति-प्रथा पर कुठाराघात किया । इसी प्रकार
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