eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 24

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लेकिन किसी कारणवश उसके ऐतिहासिक रिम में काफी समय पूर्व यह कार्य बंद हो गया था ।
मैं इस प्रश्न पर हवचिार करना चिाहता हूं कि किस कारण हिंदू धर्म , धर्म-प्रचिार करने वाला धर्म नहीं रहा , इसके अलग-अलग सप्टिीकरण हो सकते हैं । मैं अपना निजी सप्टिीकरण प्रसिुि करना चिाहता हूं । अरसिू ने कहा है कि मनु्य एक सामाजिक प्राणी है । अपने कथन के समर्थन में अरसिू के िकषों का जो भी औहचितय रहा हो , पर इतना तो सचि है कि यह तो संभव ही नहीं है कि कोई वयश्ि शुरू से ही इतना वयश्िवादी हो जाए कि वह सवयं को अपने संगी-साथियों से एकदम अलग-थलग कर ले । सामाजिक बंधन मजबूत बंधन है और वह आतम-चिेतना के विकास के साथ ही गहरा जुड़ा हुआ है । प्रतयेक वयश्ि की अपने और अपने हित की हचिंता में दूसरों की तथा उनके हितों की मानयिा शामिल है और एक प्रकार के प्रयोजन के लिए उसका प्रयास , चिाहे उदार हो या सवा््यपूर्ण , उस हद तक दूसरे का भी प्रयास है । सभी अवस्ाओं में वयश्ि के जीवन , हितों और प्रयोजनों के लिए सामाजिक संबंध का मूल महत्व है । अपने जीवन की सभी पररशस्हियों में वह सामाजिक संबंधों की ओजशसविा को अनुभव करता है और समझता है । संक्ेप में , जैसे पानी के बिना मछली जिंदा नहीं रह सकती , वैसे ही वह समाज के बिना जिंदा नहीं रह सकता ।
इस तथय से यह निष्कर्ष निकलता है कि इससे पूर्व कि कोई समाज किसी का धर्म परिवर्तन कर सके , उसे यह देखना ही होगा कि उसके गठन में ऐसी वयवस्ा हो कि परदेसियों को उसका सदसय बनाया जा सके और वे उसके सामाजिक जीवन में भाग ले सकें । उसका उपयोग इस प्रकार का होना ही चिाहिए कि उन वयश्ियों के बीचि कोई भेदभाव न हो , जो उसमें पैदा हुए हैं और जो उसमें बाहर से लाए गए हैं । उसका हर शस्हि में खुलेदिल से सवागत होना ही चिाहिए , ताकि वह उसके जीवन में प्रवेश कर सके और इस प्रकार
उस समाज में घुलमिल और फलफूल सके । यदि परदेशी के बारे में धर्म-परिवर्तन करने वाले को कहां स्ान दिया जाए । यदि धर्म- परिवर्तन करने वाले के लिए कोई स्ान नहीं होगा , तो न तो धर्म-परिवर्तन के लिए कोई नयोिा दिया जा सकता है और न ही उसे सवीकार किया जा सकता है ।
धर्म-परिवर्तन करके हिंदू धर्म ग्िण करने वाले के लिए हिंदू समाज में ्या कोई स्ान है ? अब हिंदू समाज के संगठन में जातिप्रथा की प्रधानता है । प्रतयेक जाति में सजातीय विवाह होते हैं और प्रतयेक दूसरे का विरोध करती है या यूं कहिए कि वह केवल उसी वयश्ि को अपना सदसय बनाती है , जो उसके भीतर पैदा होता है और बाहर के किसी वयश्ि को अपने भीतर नहीं आने देती । चिूंकि हिंदू समाज जातियों का परिसंघ है और प्रतयेक जाति अपने-अपने अहाते में बंद है , अतः उसमें धर्म-परिवर्तन करने वाले के लिए कोई स्ान नहीं हैं । कोई भी जाति उसे अपनी जाति में शामिल नहीं करेगी । किस कारण हिंदू धर्म ,
धर्म प्रचिारक धर्म नहीं रहा , इस प्रश्न का उत्र इस तथय में खोजा जा सकता है कि उसने जातिप्रथाका विकास किया । जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन परसपर विरोधी हैं । जब तक सामूहिक धर्म-परिवर्तन संभव था , तब तक हिंदू समाज धर्म-परिवर्तन कर सकता था , ्योंकि धर्म-परिवर्तन करने वाले इतनी अधिक संखया में होते थे कि वे एक ऐसी नयी जाति का गठन कर सकें , जो सवयं उनके बीचि में से सामाजिक जीवन के ततव प्रदान कर सके , लेकिन जब सामूहिक धर्म-परिवर्तन की गुंजाइश न रही और केवल वयश्ि का धर्म-परिवर्तन किया जा सका तो अनिवार्य था कि हिंदू धर्म , धर्म प्रचिारक धर्म नहीं रहा , ्योंकि उसका सामाजिक संगठन धर्म- परिवर्तन करने वालों के लिए कोई स्ान नहीं बना सका ।
किस कारण हिंदू धर्म , धर्म प्रचिारक धर्म नहीं रहा , इस प्रश्न की वयाखया मैंने इसलिए नहीं की है कि एक नयी वयाखया देकर हवचिार की मौलिकता का श्रेय प्रापि कर सकूं । मैंने
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