कि वे हिंदुओं के रूप में जीवित रह सकते हैं , ्योंकि मुसलमानों ने न केवल उनिें बाहुबल के संघर््य में मात दी है , बल्क सांसकृहिक संघर््य में भी मात दी है । हाल के दिनों में इसलामी संसकृहि के प्रसार के लिए मुसलमानों ने एक नियमित और तेज अभियान चिलाया है । कहा जाता है कि धर्म-परिवर्तन के अपने आंदोलन द्ारा उनिोंने हिंदू धर्म के लोगों को अपनी ओर करके अपनी संखया में भारी वृद्धि कर ली है । मुसलमानों का कैसा सौभागय ! अज्ाि कुल के कोई सात करोड़ लोगों की विशाल संखया है । उनिें हिंदू कहा तो जाता है , पर उनका हिंदू धर्म से कोई खास घहन्ठ संबंध नहीं है । हिंदू धर्म ने उनकी शस्हि को इतना असहनीय बना दिया है कि उनिें सहज ही इसलाम धर्म ग्िण करने के लिए फुसलाया जा सकता है । उनमें से कुछ तो इसलाम में शामिल हो रहे हैं और अनय अनेक शामिल हो सकते हैं ।
हिंदू अभिजात वर्ग के मानस में खलबली मचिाने के लिए यह काफी है । यदि हिंदू संखया में अधिक होने पर भी मुसलमानों का सामना नहीं कर सकते तो उस समय उनकी ्या दुर्गति होगी , जब उनके अनुयायियों की संखया इसलाम धर्म ग्िण कर लेने के कारण और घटि जाएगी । हिंदू अनुभव करने लगे हैं कि उनिें अपने लोगों को इतर धर्म में जाने से रोकना होगा । उनिें अपनी संसकृहि को बचिाना होगा । इससे शुद्धि आंदोलन या लोगों को पुनः हिंदू धर्म में लेने के आंदोलन की उतपहत् हुई । कुछ रूढ़िवादी लोग इस आंदोलन का विरोध इस आधार पर करते हैं कि हिंदू धर्म कभी भी धर्म प्रचिार करने वाला धर्म नहीं था और हिंदू को ऐसा होना चिाहिए । इस दृष्टिकोण के पक् में कुछ कहा जा सकता है । जहां तक समृहि या परंपरा पहुंचि सकती है , उस काल से आज तक कभी भी धर्म प्रचिार हिंदू धर्म का वयवहार पक् नहीं रहा है ।
मिशनों के निवेदन-दिवस 3 दिसंबर , 1873 को वेस्टमिनसटिर ए्बे की ओर से महान जर्मन विद्ान और प्रा्यहवद प्रोमै्समूलर ने जो अभिभार्ण दिया था , उसमें उनिोंने जोरदार
श्दों में कहा था कि हिंदू धर्म , धर्म-प्रचिार करने वाला धर्म नहीं है । अतः जो रुढ़िवादी वर्ग सवा््य परायणता में हव्वास नहीं करता , वह अनुभव कर सकता है कि शुद्धि के उनके विरोध का सुदृढ़ आधार है , ्योंकि उस प्रथा का हिंदू धर्म के सववोपरि मूल सिद्धांतों से प्रतयक् विरोध है , लेकिन वैसी ही खयाहि वाले अनय विद्ान हैं , जो शुद्धि आंदोलन के पक्धरों का समर्थन करते हैं । उनकी राय है कि हिंदू धर्म , धर्म-प्रचिार करने वाला धर्म रहा है और वह ऐसा हो सकता है । प्रो . जौली ने अपने लेख ' डाई औसब्रेटुंग डेर इंडिसचिेन फुल्टर ' में उन साधनों और उपायों का विशद वर्णन किया है , जो देश के आदिवासियों के बीचि हिंदू धर्म के प्रचिार-प्रसार के लिए प्राचिीन हिंदू राजाओं एवं प्रचिारकों ने अपनाए हैं ।
प्रो . मै्समूलर के तर्क का खंडन करने वाले
दिवंगत सर अ्फेड लयाल ने भी यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदू धर्म ने धर्म का प्रचिार किया है । केस की संभावयिा निश्चय जोली और लयाल के पक् में दिख पड़ती है , ्योंकि जब तक हम यह नहीं मानते कि हिंदू धर्म ने निश्चय ही कुछ-न-कुछ प्रचिार व प्रसार का कार्य किया , तब तक इस बात का आकलन नहीं किया जा सकता कि किस प्रकार उसका प्रसार एक ऐसे विशाल महाद्ीप में हुआ , जिसमें अपनी-अपनी विशिष्ट संसकृहि वाली विभिन्न जातियां बसी हुई हैं । इसके अलावा कतिपय यज्ों तथा योगों के प्रचिलन को तभी सप्टि किया जा सकता है , जब यह मान लिया जाए कि ब्ातयों ( पतितों , अनायषों ) की शुद्धि के लिए अनु्ठान थे । अतः हम निरापद रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्राचिीन-काल में हिंदू धर्म ने धर्म का प्रचिार व प्रसार किया ,
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