eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 22

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डॉ आंबेडकर की िनगाह में जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन

डॉ भीमराव आंबरेडकर

हिं भावना । एक समय था , जब इस

दू समाज की वर्तमान उथल-पुथल का कारण है , आतम-परिरक्ण के
समाज के अभिजात वर्ग को अपने परिरक्ण के बारे में कोई डर नहीं था । उनका तर्क था कि हिंदू समाज एक प्राचिीनतम समाज है , उसने अनेक प्रतिकूल शक्ियों के प्रहार को झेला है , अतः उसकी सभयिा और संसकृहि में निश्चय ही कोई अंतर्निहित शक्ि और दमखम होगा , तभी तो उसकी हसिी बनी रही , अतः उनका दृढ़ हव्वास था कि उसके समाज का तो सदा जीवित रहना निश्चित है । लगता है कि हाल की घटिनाओं ने उनके इस हव्वास को झकझोर
दिया है । हाल ही में समूचिे देश में जो हिंदू- मुशसलम दंगे हुए हैं , उनमें देखा गया है कि मुसलमानों का छोटिा-सा गिरोह हिंदुओं को पीटि ही नहीं सकता , बल्क बुरी तरह पीटि सकता है । अतः हिंदुओं का अभिजात वर्ग नए सिरे से इस प्रश्न पर हवचिार कर रहा है कि अशसितव के संघर््य में ्या इस प्रकार जीवित रहने का कोई मू्य है । जो गवजीला हिंदू सदा ही यह राग अलापता रहा है कि उसके जीवित रहने का तथय इस बात का प्रमाण है कि जीवित रहने में सक्म है , उसने कभी शांत मन से यह नहीं सोचिा कि जीवित रहना कई प्रकार का है और सभी का मू्य एक जैसा नहीं होता । हम शत्रु के सामने सीना तानकर और उसे जीत कर
अपना अशसितव कायम रख सकते हैं अथवा हम पीछे िटिकर और सवयं को सुरहक्ि स्ान में छिपाकर भी अपना अशसितव कायम रख सकते हैं ।
दोनों ही शस्हियों में अशसितव बना रहेगा , लेकिन निश्चय ही दोनों अशसितवों में आकाश- पाताल का अंतर है । महत्व अशसितव के तथय का नहीं है , बल्क अशसितव के सिर का है । हिंदू जीवित रह सकते हैं , लेकिन प्रश्न यह है कि वो आजाद लोगों के रूप में जीवित रहेंगे या गुलामों के रूप में , लेकिन मामला इतना निराशाजनक लगता है कि मान भी लें कि वे जैसे-तैसे गुलामों के रूप में जीवित रह सकते हैं , फिर भी यह पूर्णतः निश्चित नहीं दिख पड़ता
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