प्रश्न की वयाखया करके उसका उत्र दिया है , ्योंकि मैं अनुभव करता हूं कि दोनों का शुद्धि आंदोलन से अति महत्वपूर्ण संबंध हैं । चिूंकि इस आंदोलन के पक्धरों के प्रति मेरी गहरी सहानुभूति है , अतः मैं कहना ही चिाहूंगा कि उनिोंने अपने आंदोलन की सफलता के मार्ग की बाधाओं का विश्लेषण नहीं किया है । शुद्धि आंदोलन का उद्े्य है कि वह हिंदू समाज की संखया में वृद्धि करे । कोई समाज इसलिए सश्ि नहीं होता कि उसकी संखया अधिक है , बल्क इसलिए होता है कि उसका गठन ठोस होता है ।
ऐसी मिसालों की कमी नहीं है , जहां धमषोंमत्ों के एक संगठित सश्ि दल ने असंगठित धर्मयोद्धाओं की एक बड़ी सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया है । हिंदू-मुशसलम दंगों में भी यह सिद्ध हो चिुका है कि हिंदुओं की वहीं हपटिाई नहीं होती , जहां उनकी संखया कम है , अपितु उस स्ान पर भी मुशसलम उनिें पीटि देते हैं , जहां उनकी संखया अधिक होती है । मोपलाओं का मामला संगत है । केवल
उसी से पता चिल जाना चिाहिए कि हिंदुओं की कमजोरी उनकी संखया की कमी नहीं है , बल्क उनमें एकजुटििा का अभाव है । यदि हिंदू समाज की एकजुटििा को सश्ि करना है तो हमें उन शक्ियों से निपटिना होगा , जिन पर उसके विघटिन का दायितव है । मेरी आशंका है कि हिंदू समाज की एकजुटििा के स्ान पर यदि केवल शुद्धि का सहारा लिया गया तो इससे और अधिक विघटिन होगा , उससे मुशसलम संप्रदाय नाराज हो जाएगा और हिंदुओं को कोई लाभ नहीं होगा । शुद्धि के कारण जो ऐसा वयश्ि आएगा , वह बेघर ही रहेगा । वह अलग-थलग एकाकी जीवन ही बिताएगा और उसकी किसी के प्रति न कोई विशिष्ट हन्ठा होगी और न कोई खास लगाव होगा । यदि शुद्धि आ भी जाए तो उससे केवल वही होगा कि वर्तमान संखया में एक और जाति की वृद्धि हो जाएगी ।
यदि हिंदू समाज जीवित रहना चिाहता है तो उसे सोचिना ही पड़ेगा कि वह संखया में वृद्धि न करे , बल्क अपनी एकातमा में वृद्धि करे और उसका अर्थ है , जातिप्रथा का उनमूलन ।
जातिप्रथा का उनमूलन हिंदुओं का सच्ा संघठन है । जब जातिप्रथा के उनमूलन से संगठन की प्राशपि हो जाएगी तो शुद्धि की जरूरत ही नहीं रहेगी और यदि शुद्धि की भी गई तो उससे वासिहवक शक्ि प्रापि होगी । जातिप्रथा के रहते वह संभव नहीं होगा और यदि शुद्धि को अमल में लाया गया तो वह हिंदुओं के वासिहवक संघठन और एकातमा के लिए हानिकारक सिद्ध होगी , लेकिन जैसे-तैसे हिंदू समाज का अति रिांहिकारी तथा प्रबल सुधारक जातिप्रथा के उनमूलन की अनदेखी करता है । वह धमाांतरित हिंदू के पुनः धमाांतरण जैसे निरर्थक उपायों की वकालत करता है । वह कहता है कि खानपान में परिवर्तन किया जाए और अखाड़े खोले जाएं । किसी दिन तो हिंदुओं को इस बात का आभास होगा कि वे न तो अपने समाज को बचिा सकते हैं और न ही अपनी जातिप्रथा को । आशा की जाती है कि वह दिन अधिक दूर नहीं है ।
( साभार / तरेलुगु समाचार स्पेशल नंबर में प्काशित , नवंबर 1926 ) fnlEcj 2020 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 25