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दलित जनता बन रही है और हिंसक हालातों के कारण राजय एक और खूनी विभाजन की ओर अग्सर हो रहा है । आधिकारिक तौर पर 1947 में विभाजन के समय राजय में मुशसलम आबादी 19 प्रतिशत थी , जो साल 2011 में बढ़कर 27 फीसदी हो गई । 2011 के आंकड़े बताते हैं कि राजय में मुशसलम आबादी जिस तरह से बढ़ी है , उसका नकारातमक परिणाम राजय की दलित , आदिवासी और पिछड़ी हिनदू आबादी को भुगतना पड़ रहा है । तथाकथित धर्मनिरपेक् ताक़िें भले ही बंगाल को सांप्रदायिक सद्ाव की मिसाल बनाकर पेश ्यों न करती रही हों पर विभाजन के बाद कई बार होने वाले दंगों ने उनके दावों पर सवाल भी उठाए हैं । 1950 , 1963 और 1992 में हुए दंगों से लेकर वर्तमान में जाति राजनीतिक संघर््य का खामियाजा दलितों को भी भुगतना पड़ रहा है ।
पश्चिम बंगाल में दलित , आदिवासियों और पिछड़ी हिनदू आबादी सविंत्रता से पहले भी उतपीिन और दमन को झेलने के लिए अभिशपि थी और यही हालात वर्तमान में भी बने हुए हैं । राजय में सर्वहारा वर्ग के समग् क्याण का
दावा करने वाले वाममोचिा्य शासनकाल के 32 वर्षों में भी दलितों के दमन और उतपीिन की घटिनाएं लगातार होती रही और जब तृणमूल की नेता ममता ने सत्ा संभाली , उसके बाद भी शस्हियों में कोई परिवर्तन नहीं आया । राजय में दलित समाज के साथ भेदभाव , दमन और उतपीिन का सिलसिला लगातार जारी है ।
बंगाली भार्ी दलितों में , नमशुद्र और पाउंड्ोखत्रियास में रिमश : 17 और 12 प्रतिशत हिससेदारी है , जो उनिें मुखय रूप से दहक्ण बंगाल में सबसे अधिक आबादी वाला और प्रभावशाली बनाते हैं । राजबंगाशी उत्र बंगाल में एससी आबादी के 18 प्रतिशत हिससे के साथ मुखय पिछिा समुदाय का प्रतिनिधितव करते हैं । हालांकि बंगाल के अनय पिछिा वगषों के लिए कोई जनगणना आंकड़ा उपल्ध नहीं है । इसी तरह राजय में मतुआ समुदाय का भी दहक्ण बंगाल के लगभग 60 विधानसभा सीटिों पर वचि्यसव है । मुशसलमों के बढ़ते उतपीडन और उस उतपीडन के विरुद्ध ममता की चिुपपी के कारण मतुआ , नामसुद्रों सहित अनय दलित और आदिवासी जातियां एकजुटि होने लगी है ।
ममता सरकार में दलित और वंहचिि समाज की अनदेखी से पैदा हो रहा रिोध अब सड़कों पर दिखने लगा है । सरकार की नीतियों के विरोध में लगातार जारी धरना-प्रदर्शन करके अपनी मांग को पूरा करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है । पर मुखयमंत्री ममता पर इसका कोई असर फिलहाल दिख नहीं रहा है और वह अपनी पार्टी द्ारा पोहर्ि गुंडों के बल पर अपनी सत्ा को बचिाने की कोशिश में जुटिी हुई हैं । ममता की निगाहें जंगलमहल इलाके में दलित और आदिवासी समाज के लगभग 40 प्रतिशत मतदाताओं पर केंद्रित हैं । सिर्फ बांकुिा जिले में ही विधानसभा की 12 सीटिें हैं और जिले में दलित और आदिवासी आबादी 38.5 प्रतिशत है । इसी प्रकार पुरुलिया , पश्चिम मेदिनीपुर और झािग्ाम जिलों की उन 32 विधानसभा सीटिों पर दलित और आदिवासी हार-जीत का निर्णय कराने में सक्म है । 2019 के लोकसभा चिुनाव में भाजपा को इस क्ेत्र में जो बढ़त मिली थी , ममता भाजपा की उसी वोटि बैंक को अपनी और खींचिने के लिए हर कोशिश कर रही हैं ।
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