eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 14

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अधिकार हैं ।
यह हमारे समाज की अज्ानता ही है कि हमने बाबा साहेब आंबेडकर को महज ‘ दलितों का मसीहा ’ और ‘ संविधान निर्माता ’ जैसी पदावली में रिड्ूस कर दिया है । अगर आप ठीक से आंबेडकर को जानें और पढ़ें तो पता चिलेगा कि भारतीय समाज के सवाांगीण विकास को लेकर उनकी अपनी एक विशेर् दृष्टि थी , जिसका अंश मात्र हम भारतीय समाज में आज देख पा रहे हैं । यदि सिर्फ महिलाओं को लेकर डॉ . आंबेडकर के हवचिार-दर्शन को ठीक से समझने का प्रयास करें तो समझ में आ जाएगा कि भारतीय समाज में जो सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक गैर बराबरी है , उसका नाश मूलत : और अंतत : सत्री की मुक्ि से ही संभव है । और सत्री की पराधीनता के लिए केवल पुरुर् ही जिममेदार नहीं है , बल्क इसके पीछे कम से कम दो हजार साल से चिली आ रही ब्ाह्मणवादी मर्दवादी सत्ा जिममेदार है , जिसे शासत्रों और वर्णवयवस्ा की आि में इस कदर निर्मित किया गया कि न केवल सत्री बल्क पूरा का पूरा भारतीय समाज ही जाति और वर्णवयवस्ा के अंधकूप में इस कदर धंसता चिला गया कि आज इ्कीसवीं सदी में भी वह इससे मु्ि नहीं हो पा रहा है ।
डॉ . आंबेडकर के लिए निम्न जाति के सत्री-पुरुर् की ही नहीं , समूचिे भारतीय समाज की और उसमें भी विशेर् रूप से सवर्ण जाति की शसत्रयों की मुक्ि और समानता का मुद्ा विशेर् रूप से हचिंता का केंद्र था । उनकी मूल स्ापना ही यह थी कि वर्णाश्रम आधरित जाति वयवस्ा के वजूद को बनाए रखने और उसे निरंतर मजबूत करने के लिए मुखय औजार सत्री को ही बनाया गया । ्योंकि भारतीय समाज में विवाह ही एकमात्र ऐसी संस्ा है जो जाति वयवस्ा को बनाए रखती है । बाल विवाह , सती प्रथा और विधवा विवाह पर रोक ऐसी ही प्रथाएं हैं , जिनके माधयम से सत्री को जाति से बाहर नहीं जाने के कठोर प्रावधान लागू किए गए । इन तरीकों से सत्री की यौनिकता को भी सीमित- नियंत्रित किए जाने का षड़यंत्र रचिा गया । बाल
विवाह से सत्री आजनम जाति बंधन में बंध जाती है । सती प्रथा से विधवा शसत्रयां समापि हो जाती हैं और विधवा विवाह पर रोक से महिलाएं जाति के दायरे में कैद हो जाती हैं ।
डॉ . आंबेडकर ने 1917 में प्रसिुि अपने शोधपत्र में इस बात को रेखांकित किया था कि विवाह के इन बंधनों ने समाज में ‘ सरपलस ’ महिलाओं को नियंत्रित करने का ऐसा दु्चिरि रचिा कि वर्ण और जाति की वयवस्ा लगातार मजबूत होती रही , जिसमें सत्री का हर प्रकार से अमानवीयता की हद तक शोर्ण होता रहा । इसके लिए डॉ . आंबेडकर मनुसमृहि का गहन विश्लेषण कर यह स्ाहपि करते हैं कि मनु द्ारा निर्मित जाति वयवस्ा में सत्री को ही मुखय आधार बनाया गया और इस रिम में उसे हर प्रकार से नीचिे गिराने और नियंत्रित करने की एक वैधानिक वयवस्ा बनाई गई । इसीलिए डॉ . आंबेडकर ने जब संसद में हिंदू कोड बिल प्रसिुि किया तो उनिोंने विसिार से संसद को बताया कि विधिसममि विवाह के लिए जाति की अनिवार्यता समापि होनी चिाहिए अर्थात कोई भी सत्री या पुरुर् किसी भी जाति में शादी करे तो उसे वैधानिक विवाह माना जाए ।
बहुविवाह प्रथा की समाशपि हो और एक पुरुर् एक ही सत्री से विवाह करे और तलाक या विवाह हव्छेद की सबको अनुमति हो । इस बिल में बाबा साहेब ने हिंदू विवाह अधिनियम , हिंदू उत्राधिकार अधिनियम , हिंदू अवयसक एवं संरक्ण अधिनियम तथा हिंदू दत्क एवं भरण-पोर्ण अधिनियम को शामिल किया था । इसके साथ ही पैतृक संपहत् में पुत्री को पुत्र के समान अधिकार देने की वयवस्ा की गई थी । लेकिन ततकालीन राजनैतिक और सामाजिक माहौल में इस बिल का जबरदसि विरोध हुआ और बाबा साहेब को हिंदुओं का दु्मन और न जाने ्या-्या कहा गया । डॉ . आंबेडकर ने राजनेताओं और समाज की दुर्भावनापूर्ण प्रतिहरियाओं के चिलते बिल को असवीकार करने को लेकर इसिीफा दे दिया । बाद में ये सब कानून धीरे-धीरे कर लागू किए गए , लेकिन इस प्रहरिया में असंखय महिलाओं को अपने अधिकारों की आहुति देकर प्राण तयागने पिे । सोहचिए कि यदि 1951 में ही यह बिल सवीकार कर लिया जाता तो भारतीय हिंदू महिलाओं का जीवन कितना बेहतर होता । लोगों ने बाबा साहेब को कितना गलत समझा इसका एक
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