उदाहरण देखिए , जैसे उनिोंने कहा कि यह बिल हिंदू महिलाओं या पुरुर्ों को जाति से बाहर विवाह की अनुमति देता है , लेकिन कोई चिाहे तो जाति में भी शादी कर सकता है । परंतु लोगों ने इसे जाति तोिने वाला कानून समझा । डॉ . आंबेडकर ने धर्मशासत्रों से उदाहरण देकर बताया कि हिंदू समाज में अंतर्जातीय विवाह सदियों से होते आए हैं , लेकिन लोगों ने नहीं सुनी । संसद द्ारा बिल असवीकार किए जाने पर इसिीफा देते हुए उनिोंने कहा था :
‘’ इस देश में हिंदू कोड बिल अब तक का सबसे बिा सामाजिक सुधार का कानून था । इस देश के इतिहास में इससे पहले और आने वाले वर्षों में इससे बिा कोई कानून इतना महतवपूर्ण न था और न होगा । वर्ग भेद और लिंग भेद हिंदू समाज की आतमा है और इनको छूए बिना आर्थिक सुधार के कानून बनाने का मतलब है गोबर के ढेर पर महल बनाना । मैं इसके महतव से पररहचिि हूं और इसीलिए इससे जुिाव है मेरा । अपने वैचिारिक मतभेदों के बावजूद मैं इस बिल के हित में इसके लिए खिा हूं ।‘ और बाबा साहब अपने प्रति ईमानदारी बरतते हुए , खुद से बेईमानी न करते हुए बिल
असवीकार करने पर इसिीफा देकर अलग हो गए । असलियत में यह बिल उस पितृसत्ा के विरोध में था जो सत्री के माधयम से पूरे समाज को अपनी जकि से बाहर नहीं निकलने देना चिाहती है , उसी ने इसका सबसे जयादा विरोध किया । दुर्भागय से उस समय की सवर्ण शसत्रयों तक ने हिंदू कोड बिल का विरोध किया । कहना ना होगा कि हिंदू कोड बिल के माधयम से सत्री मुक्ि के जो सवाल बाबा साहेब आंबेडकर ने खिे किए थे , उनकी अनुगूंज बहुत दूर तक गई और 1955-56 तक आते-आते उसके कई प्रावधानों को लागू किया गया और 1976 तक तो लगभग पूरा बिल ही लागू कर दिया गया । शसत्रयों की आवाज मुखर करने में और आरंभिक महिला आंदोलनों के विकास में और उनकी हवचिारणा में डॉ . आंबेडकर के हवचिार और इस बिल की भावनाएं केंद्र में रहीं ।
हिंदू कोड बिल के माधयम से भारतीय शसत्रयों के साथ समूचिे समाज की मुक्ि का सवप्न साकार करने के इरादे से बहुत पहले यानी 1927 में बाबा साहेब आंबेडकर भारतीय शसत्रयों के लिए एक ऐसा कानून बना चिुके थे , जिसका लाभ हर कामकाजी महिला उठा रही है और
उनिें ज्ान तक नहीं कि यह अधिकार दिलाने वाले डॉ . आंबेडकर थे । बॉमबे विधान पररर्द में उनिोंने सवैतनिक मातृतव अवकाश का अधिकार दिलाया था और इसे तमाम सरकारी संस्ानों में लागू करवाया था । इस बिल के बारे में उनिोंने कहा था , ‘ यह रा्ट्र के हित में ही होगा कि माताओं को प्रसव से पूर्व और बाद में आराम मिलना चिाहिए । यह बिल मातृतव के इसी सिद्धांत पर लाया गया है । ऐसा करते हुए मैं सवीकार करता हूं कि इसका भार सरकार को वहन करना चिाहिए । मैं यह तथय सवीकार करने के लिए तैयार हूं कि जन क्याण का संरक्ण सरकार का प्राथमिक सरोकार है । और प्रतयेक देश में आप पाएंगे कि मातृतव लाभ का दायितव सरकारों द्ारा ही वहन किया जाता है ।‘
डॉ . आंबेडकर ने महिलाओं की गरिमा और समानता को संविधान में बहुत महतव दिया । संविधान के अनु्छेद 14 , 15 , 16 , 23 , 39 , 42 , 51 और 243 के अनेक प्रावधानों में महिला सुरक्ा , समानता , बराबरी के अधिकार आदि की वयवस्ा करते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि शसत्रयां इस देश के सवाांगीण विकास में पुरुर्ों की हमकदम बनकर देश को आगे ले जाएं । हिंदू कोड बिल पेश करते हुए उनिोंने कहा था , जो अधिकार मैं संविधान के माधयम से बहुसंखयक भारतीय महिलाओं को नहीं दे पाया , वे अधिकार इस बिल के माधयम से हासिल होंगे । वे ऐसा इसलिए भी कह रहे थे कि उनके सतयाग्ि और आंदोलनों में दलित ही नहीं सवर्ण शसत्रयां भी समान रूप से भाग लेती थीं । 1927 में मंदिर प्रवेश के लिए चिले महाि सतयाग्ि में उनके साथ शांता बाई शिंदे जैसी सवर्ण महिलाएं भी उनका साथ दे रही थीं । ऐसी अनेक महिलएं बाबा साहेब के साथ अछूत-दलित वर्ग की महिलाओं के उत्ान के लिए काम कर रही थीं । इस प्रकार हम देखें तो डॉ आंबेडकर वासिव में समपूण्य समाज के हितैर्ी थे और जीवनभर उनिोंने समाज के उत्ान के लिए ही कार्य किया ।
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