eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 13

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डॉ . आंबेडकर का महिलाओं के लिए योगदान

प्रेमचंद गांधी

समाज में सदियों पुरानी एक हवचिार परंपरा काम कर रही भारतीय

है जिसके तहत किसी भी वयश्ि , दर्शन , घटिना , अंचिल आदि को सूत्रबद्ध कर एक खास तरह की उपाधि या अपमानजनक अवधारणा से इस तरह बांध दिया जाता है कि सब कुछ उसी में समाहित हो जाता है । इस अवधारणा का शिकार हमारे देखते-देखते गांधी , नेहरू और आंबेडकर इस कदर हुए हैं कि एक वर्ग विशेर् के लोगों ने इन महापुरुर्ों को इस विशाल देश के पतन का सबसे मुखय अपराधी घोहर्ि कर दिया है । पिछले कई वर्षों
से देश के अलग-अलग हिससों से आंबेडकर की मूर्तियां तोिने , उनकी प्रतिमाओं पर कालिख पोतने और उनके बारे में तरह-तरह का दु्प्रचिार कर उनको अपमानित करने की जो घटिनाएं प्रकाश में आती रही हैं , वे सब यही बताती हैं कि बाबा साहेब आंबेडकर के वयश्ितव और हवचिारों से असहमति इस देश में एक भयानक घृणा का रूप ले चिुकी है । इसमें दिलचिसप बात यह है कि हमारे देश की आधी आबादी यानी महिला जगत को इस बाबत शायद बहुत कम जानकारी है कि डॉ . आंबेडकर के पूरे जीवन संघर््य में जिस समानता आधारित समाज के निर्माण की परिक्पना थी , उसका पूरा आधार
ही सत्री-मुक्ि था । जाति-धर्म और लिंग आधारित शोर्ण की समाशपि बाबा साहेब के दर्शन में पूरी तरह महिलाओं की आजादी से ही संभव थी । इसलिए डॉ . आंबेडकर के अपमान की कोई घटिना हो तो मेरे हिसाब से उसका प्रतिकार सबसे पहले शसत्रयों की ओर से होना चिाहिए । ्योंकि महिलाओं के लिए बाबा साहेब ने जो काम किए और जो काम वे करने वाले थे , उनके बिना भारतीय समाज में सत्री-मुक्ि का सवप्न अधूरा ही रहता । आज भारतीय महिलाओं की जो भी बेहतर शस्हि है उसके मूल में डॉ . आंबेडकर के कठोर निर्णयों से बने कानून और शसत्रयों को मिले बेशुमार
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