समाज
करें । यहीं मेहात्मेा गांधी को ्लिामेी श्रद्धानंद जी के मेाध््यम सबे दवलतों के लिए कुछ कायरा करनबे की प्रबेरर्ा वमेली । उन्होंनबे जो कुछ भी किया वह केवल समेाज को दिखानबे के लिए किया । कोई मेौलिक योजना उनके पास ऐसी नहीं थीी, जिससबे दवलतों का क्कयार् हो सके या वह उन्हें समेाज मेें सम्मेानजनक ्लथीान दिला सकें ।
वर््तमान समेय मेें राजनीतिक दलों को ्बड़ौदा नरबेश और आयरा राजा महेेंद्र प्रताप के दवलतों के क्कयार् सं्बंधी कायषों सबे प्रबेरर्ा लबेनी चाहिए । आज दबेश मेें राज्यसभा और लोकसभा के कुल वमेलाकर लगभग आठ सौ सांसद हैं । पर उनमेें सबे कोई एक भी राजा महेेंद्र प्रताप या मेहाराजा ्बड़ौदा ्बननबे का साहस नहीं रखता । ्लिामेी श्रद्धानंद जी मेहाराज जैसबे मेहापुरुषों का अनुकरर् तो वह कभी कर ही नहीं सकतबे हैं । इनकी राजनीतिक इच्छाशक््तत केवल यहीं तक है कि वह किसी प्रकार हाथी उठानबे वालबे सांसद ्बनकर लोकसभा या राज्यसभा मेें जाकर ्बैठ जाएं । इस प्रकार दबेश का वर््तमान लोकतांत्रिक ढांचा भी राजनीतिक गुलामोों को जन््म दबेनबे मेें सहायक हुआ है ।
कांग्रेस नबे कभी भी दलित सबे मेुसलमेान या ईसाई ्बनबे लोगों को फिर सबे हिंदपू ्बनानबे का
कामे नहीं किया । जो लोग हिंदपू दलित सबे इ्ललामे या ईसाइयत मेें दीवक्त हो गए, उन्हें कांग्रेस नबे जानबे दिया ।
इस प्रकार दवलतों को ही वमेर्ाकर और उन्हें विधर्मी ्बन जानबे दबेनबे की खुली छूर् दबेकर कांग्रेस नबे दबेश को तोड़नबे की प्रवृवत् को भी ्बढ़ािा दिया । इसके विपरीत ्लिामेी श्रद्धानंद जी मेहाराज नबे दवलतों को आयरा समेाज मेें लाकर उन्हें सं्लकारित ्बनानबे का कायरा किया । ऐसा करनबे के पीछ़े ्लिामेी जी मेहाराज का एक ही उद्देश््य थीा कि ज्ब वह आयरा समेाज मेें दीवक्त हो जाएंगबे तो हिंदपू समेाज के लोग उन्हें मेंवदरों मेें प्रिबेश करनबे की अनुमेवत देंगबे । पर ऐसा हुआ नहीं । त्ब ्लिामेी श्रद्धानंद जी नबे ्बहुत दुखी होकर“ लीडर” मेें 11 मेई 1924 को लिखा थीा कि इसका मेतल्ब यह है कि दलित िगषों का कोई भी आदमेी ज्ब तक हिंदपू समेाज और धर््म का परित्याग नहीं करबेगा त्ब तक अपनी सामेाजिक अक्षमताओं सबे छुर्कारा नहीं पा सकता ।
उन्होंनबे‘ हिंदपू संगठन’ मेें( 1924) लिखा थीा कि जो लोग अपनबे ही समेाज के एक तिहाई लोगों को गुलामे ्बनाए ्बनाए हुए हैं और उन्हें पैरों तलबे कुचल रहबे हैं, उन्हें विदेशियोों द्ारा किए
गए अत्याचारों के विरुद्ध शिकायत करनबे का कोई अधिकार नहीं है । ्लिामेी जी मेहाराज नबे मेद्रास मेें एक विशाल जनसभा को सं्बोधित करतबे हुए कहा थीा कि हिंदुओ! अपनबे दलित कहबे जानबे वालबे ्बंधुओं को मेान-सम्मेान दबेकर उन्हें अपना अवभन् अंग समेझो । अ्लपृ्चयता का परित्याग करो । यह पाप है और यह रोग तुम्हें लबे डू्बबेगा । तुमे यदि आज इन्हें नहीं अपनाओगबे तो फिर एक समेय ऐसा आएगा ज्ब तुमे इन्हें अपनबे मेें वमेलाना चाहोगबे परंतु यह तुम्हारबे निकर् नहीं आएंगबे ।
्लिामेी श्रद्धानंद जी मेहाराज का उपरो्तत कथीन आज सत्य सिद्ध हो रहा है । दलित िगरा को लुभा कर मेतांतरित करनबे के लिए इ्ललामे और ईसाइयत पपूरी तरह सवरिय हैं । एक प्रकार सबे दवलतों को इन दोनों विदबेशी धमेारािलंबियोों को पट्टे पर दबे दिया गया । अपनबे ही लोग अथीारात अपनबे ही समेाज के दलित ज्ब मेुस््ललिम या ईसाई ्बनतबे हैं तो वह भारत के लोगों के प्रति और भारतीयता के प्रति ्बहुत ही अधिक दुभाराि रखतबे दबेखबे जातबे हैं । समेय अभी भी है यदि अ्ब भी हमेनबे स््थथिति पररक््लथीवतयों को संभाल लिया तो आज भी एक मेज्बपूत और सश्तत भारत का निर््ममाण करनबे मेें सफल हो सकतबे हैं । �
अगस््त 2026
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