विचार
प्रश्लत करबे । जावतयों को संगठित करनबे मेें उनका यकीन नहीं थीा ्तयोंकि जातीयता हिन्दपू समेाज की एकता मेें ्बाधक थीी । इसी व्यि्लथीा के निवारर् के मेद्दबेनजर जातियां ्बंधन सबे ऊपर उठकर पार्लपरिक समेरसता कायमे करनबे के वह प्र्बल पक्धर थीबे । इसी शा्चित दृश््टटिकोर् के आलोक मेें राष्ट्ीय ्लियं सबेिक संघ का सफर सतत जारी है । इस अभियान मेें दलित, आदिवासी, वनवासी, पिछड़़े-अगड़़े सभी शावमेल हैं और समेरसता की वमेसाल पबेश करनबे मेें कामेया्ब हुए हैं ।
्लितंत्रता वमेलनबे के ्बाद गांधी जी नबे अपनबे उदगार व्य्तत करतबे हुए कहा थीा कि ्लिराज तो वमेल गया पर अ्ब हमेें सुराज लगाया है । ऐसी हकीकत के आलोक सबे रू्बरू करतबे हुए विचारक, चिंतक और राष्ट्ीय ्लियं सबेिक संघ के दिग्दशराक पंडित दीनदयाल उपाध्याय नबे ्बबे्बाक शैली मेें रबेखांकित किया है कि अगर दबेश विकास कर रहा है और अगर इस दबेश के विकास की किरर् हमेारी सीढ़ी पर खड़़े उस अंवतमे व्यक््तत तक नहीं पहुंच रही तो दबेश का विकास ्बबेमेानी होगा । निश््चचत ही इन दोनों ही मेहापुरषों नबे अपनबे अपनबे उदगारों सबे दबेश समेाज का समग्र विकास और मेज्बपूत भविष्य ्बनानबे की दिशा मेें न वसफ्क प्रबेरक मेशाल दिखाई थीी, ्बक््कक आगाह भी किया थीा । एक लम््बबे अरसबे तक सत्ा शिविरों
सबे यह उदगार मेुखर होतबे तो दबेखबे गए लबेवकन परदबे के पीछ़े का सच यह भी ्बबेनका्ब करता रहा कि जमेीनी धरातल पर इसबे अमेल मेें नहीं लाया गया । नतीजा सामेनबे है ।
जाति की सीमेाओं को तोड़तबे हुए पार्लपरिक समेरसता की डगर पर स्बका साथी-स्बका विकास के उद्घोष के साथी आगबे ्बढ़तबे हुए आज दबेश को एक ऐसा प्रधानमेंत्री नरेंद्र दामेोदर दास मेोदी के रूप मेें वमेला है, जो सुराज लानबे का गाँधी जी का सपना साकार करनबे और पंडित दीनदयाल के उदगार अंवतमे पायदान पर खड़़े व्यक््तत के विकास के लिए कृत संक्कप होनबे का अहसास यथीार््थ के धरातल सबे पपूरी शिद्दत के साथी करा रहा है । भाजपा शासित राज्यों मेें हाल मेें हुई दलित उत्पीड़न की घर्नाओं की जितनी भी निंदा की जायबे, कामे होगी । लबेवकन दबेश के प्रधानमेंत्री नरेंद्र मेोदी नबे अपनबे कड़़े रूख का अहसास भी कराया है । मेागरा ्बाधाओं सबे विचलित हुए व्बना दवलतों के समग्र विकास का उनका अभियान सतत जारी है और लक्षय को हासिल करनबे के लिए भी कृत संक्कप है ।
राजनीति के खबेल का इसबे प्रतीक कहा जायबेगा कि मेामेपूली मेौका वमेलतबे ही विकास की समग्र मेुवहमे की हवा निकलनबे की सावजशें शुरू हो जाती है । नबेपथ्य के आगबे पीछ़े सबे जारी खबेल की भी दरअसल अपनी ्बबेचैनी है । दवलतों और
पिछड़ोों की लड़ाई का दावा करनबे वालबे वामे दल अ्ब काफी पीछ़े छूर् चुके हैं । इसकी वामे दलों नबे कभी क्कपना भी नहीं की थीी । कांग्रेस की ्बैशाखी ्बननबे और उसके साथी कन्धा सबे कन्धा वमेलाकर चलनबे मेें उन्होंनबे किंचित परहबेज नहीं किया । यही वह व्बंदु हैं, जिसकी भरपाई करना वामे दलों के लिए फिलहाल संभव नहीं है । िगरा शत्रु सबे हाथी वमेलानबे का कुपररर्ामे है भरोसबे का र्ूर्ना । इसी र्ूऱ्े भरोसबे की वजह सबे कांग्रेस और वामे दल अ्ब राजनीति के किनारबे पर आ कर खड़़े हो गए हैं । दलित और आवथीराक रूप सबे पिछड़़े लोगों के विकास का ढोंग करनबे और निज हित साधकर अपनबे को सुदृढ़ करनबे के खबेल का दौर समेाप्त हो चुका है । अ्ब वस्तका उसी का चलबेगा जो दवलतों के समग्र विकास की इ्बारत लिखबेगा । इस कसौर्ी पर प्रधानमेंत्री नरेंद्र मेोदी का संक्कप स्बका साथी-स्बका विकास, व्यक््तत पैमेानबे पर खरा उतरनबे का सहज ही अहसास करा दबेता है ।
दलित चिंतन विकास के परिप्रेश््य मेें लोकमेान्य तिलक के वहमेालय सरीखबे व्यक््ततत्ि- विचार-कृतित्ि को कदापि अ्लिीकार नहीं किया जा सकता है । ्लितंत्रता वमेलनबे के लगभग तीन दशक पहलबे ही अपनबे दृढ संक्कप और दपूर दृष््टटि इरादबे को ि्तत के पन्ों पर अंकित कर दबेनबे वमेसाल उन्होंनबे कायमे की थीी । दो र्ूक शब्दों मेें उन्होंनबे विद्रोही व्बगुल ्बजाया थीा कि यदि ई्लिर अ्लपृ्लयता को मेानबेगा तो मैैं उसके अक््लतत्ि को ्लिीकार करनबे को तैयार नहीं हपूँ । निश््चचत ही लोकमेान्य तिलक एक ्बबेजोड़ शिखर ह्लताक्र थीबे । उनका निधन भलबे ही 1 अग्लत 1920 को भलबे ही हो गया हो, लबेवकन वह भारतीय मेानस पर्ल पर अपनी अवमेर् छाप के साथी साथी युगों तक अमेर रहेंगबे । इस कड़ी मेें एक शा्लित ्बात ्बा्बा साह्ब अम््बबेडकर नबे भी कही थीी, वह यह कि दबेश की राजनीति मेें शीषरा ्लथीान पर ्बैठ़े लोग चरित्रवान होनबे चाहिए । सम्पपूर््ण समेाज के उत्कषरा का मेनोभाव और व्यक््ततगत ्लिाथीवो की शपून्यता ही श्रबेष्ठ चरित्र का लक्षण और इसी सबे ही दलित समेाज का समग्र क्कयार् और विकास संभव है । �
अगस््त 2026
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