संदभ्ष
जातिवाद की राजनीति करना चाहतबे हैं इसलिए वह जातिवाद और छुआछूत को और ्बढ़ािा दबेकर समेाज मेें दीवार खड़ी करतबे हैं और ऐसा भारत मेें ही नहीं दपूसरबे देशोों मेें भी होता रहा है ।
यह कहनबे की आि्चयकता नहीं है कि हिन्दुओं मेें आदिकाल सबे गोत्र व्यि्लथीा रही है । वर््ण व्यि्लथीा भी थीी, परन्तु जातियाँ नहीं थीीं । िबेद सम््मत वर््ण व्यि्लथीा समेाज मेें विवभन् कायषों के विभाजन की दृष््टटि सबे लागपू थीीं यह व्यि्लथीा जन््म पर आधारित न होकर सीधबे-सीधबे कर््म( कायरा) पर आधारित थीी । कोई भी वर््ण दपूसरबे को ऊँचा या नीचा नहीं समेझता थीा । उदाहरर् के लिए- अपनबे प्रारंभिक जीवन मेें शपूद्र कर््म मेें प्रवृत् वा्कमेीवक जी ज्ब अपनबे कमेषों मेें पररितरान के ्बाद पपूजनीय ब्ाह्मणोों के वर््ण मेें मेान्यता पा गए, तो िबे तत्कालीन समेाज मेें मेहवषरा के रूप मेें प्रवतक्ष्ठत हुए । श्री रामे सहित चारों भाइयों के विवाह के अवसर पर ज्ब जनकपुर मेें राजा दशरथी नबे चारों दु्कहनों की
डोली लबे जानबे सबे पहलबे दबेश के सभी प्रवतक्ष्ठत ब्ाह्मणोों को दान और उपहार दबेनबे के लिए ्बुलाया थीा, तो उन्होंनबे श्री वा्कमेीवक जी को भी विशबेष आदर के साथी आमेंत्रित किया थीा ।
छुआछूत वैदिक, रामेायर् और मेहाभारत काल मेें नहीं थीी । यह उन्होंनबे ठीक कहा, ्तयोंकि हिन्दपू समेाज मेें शपूद्रों को अछूत नहीं समेझा जाता थीा । वैदिक काल मेें सभी का दजारा समेान थीा । ऋग्िबेद मेें लिखा हैः-
“ सं गच्छध्िं सं वदध्िं वो मेनासि जानतामे”( ऋ. 1-19-2)
“ समेानी प्रपा सह वोन् भागः समेानबे यो्तत्रबे सह वो यपूनज््ममि सम्यंचोअवनिम् समर््यतारा नाभिभिवाभितः”( अ. 3-30-6)
अथीारात्-हबे मेनुष्यों, वमेलकर चलो, वमेलकर ्बोलो । तुमे स्बका मेन एक हो, तुम्हारा खानपान इकट्ा हो । मैैं तुमेको एकता के सपूत्र मेें ्बाँधता हपूँ । जिस प्रकार रथी की नाभि मेें आरबे जुड़़े रहतबे हैं, उस प्रकार एक परमेबे्चिर की पपूजा मेें तुमे
स्ब इकट्ठे वमेलबे रहो ।
इस िबेद मेंत्र सबे यह सिद्ध होता है कि उस समेय कोई जाति या वर््ण भबेदभाव नहीं थीा । सभी मेानव जाति एक थीी और एकता के भाव को रखतबे हुए स्बके लिए सुख शांति की कामेना करतबे थीबे । वैदिक काल मेें आध्याक्त्मेकता सिखलाई जाती थीी, जिसबे हासिल कर के ्लिाभाविक ही शारीरिक और मेानसिक सभी भबेदभाव नहीं पायबे जातबे थीबे ।
्बहुत सबे ऐसबे ब्ाह्मर् हैं जो आज दलित हैं, मेुसलमेान है, ईसाई हैं या अ्ब वह ्बौद्ध हैं । ्बहुत सबे ऐसबे दलित हैं जो आज ब्ाह्मर् समेाज का वह्लसा हैं । यहां ऊंची जाति के लोगों को सवर््ण कहा जानबे लगा हैं । दवलतों को ्चदवलतश् नामे हिन्दपू धर््म नबे नहीं दिया, इससबे पहलबे हरिजन नामे भी हिन्दपू धर््म के किसी शा्लत्र नबे नहीं दिया । इसी तरह इससबे पूर््व के जो भी नामे थीबे, वह हिन्दपू धर््म नबे नहीं दिए । अ्ब प्रश्न यह उत्पन् होता है कि छुआछूत वैदिक, रामेायर् और मेहाभारत काल मेें नहीं थीी तो क्ब आरम्भ हुई । अधिकतर पुराणोों और ्लमेृवतयों मेें इसका उ्कलबेख है । यबे ग्न््थ भी सन्तों-ऋवषयों द्ारा लिखबे गयबे, जिसमेें उन्होंनबे अपनबे विचार इस ढ़ंग सबे प्रकर् किए जिसके अनबेक अर््थ निकलतबे हैं । यह उनकी वर््णन शैली का चमेत्कार थीा । उन्होंनबे अपनबे अन्तर के अनुभव, जिसबे उन्होंनबे ्बड़़े-्बड़़े साधन करके, अनुष्ठान करके प्राप्त किया । कथीा- कहानी के रोचक रूप मेें समेय की मेांग के मेुताव्बक ग्न्थीों मेें भर दिया । समेय व्यतीत होनबे पर लोगों नबे उनके असली भाव को न समेझ कर उलऱ्े अर््थ लगा लिए जो हिन्दपू समेाज के लिए हानिकारक सिद्ध हुए ।
आज जो नामे दिए गए हैं वह पिछलबे 70 िषरा की राजनीति की उपज है और इससबे पहलबे जो नामे दिए गए थीबे वह पिछलबे 900 साल की गुलामेी की उपज है । भारत नबे 900 साल मेुगल और अंग्बेजों की गुलामेी मेें ्बहुत कुछ खोया है खासकर उसनबे अपना मेपूल धर््म और सं्लकृवत खो दी है । असल मेें, दो तरह के लोग होतबे हैं- अगड़़े और पिछड़़े । यह मेामेला उसी तरह है जिस तरह की दो तरह के क्षेत्र होतबे हैं विकसित
अगस््त 2026
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