बदल्ते दौर
जाति, अनुसपूवचत जनजाति और मेवहलाओं के लिए आरवक्त सीटोों का वनधारारर् भी किया जाएगा । इसलिए परिसीमेन केवल चुनावी न्तशा ्बदलनबे की प्रवरिया नहीं है, ्बक््कक यह भारतीय लोकतंत्र के सामेाजिक प्रतिनिधित्ि को नए सिरबे सबे परिभाषित करनबे का अवसर भी है । विशबेषज्ञों का मेानना है कि नई जनसंख्या के अनुरूप सीटोों का पुनगराठन लोकतंत्र को और अधिक प्रतिनिधिक ्बनाएगा ।
अनुसपूवचत जाति की मेवहलाओं के लिए यह पररितरान विशबेष मेहत्ि रखता है । दशकों तक दलित समेाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्ि की चचारा मेुख्यतः पुरुष नबेतृत्ि तक सीवमेत रही । ग्रामीर्
क्षेत्रों मेें सामेाजिक और आवथीराक चुनौवतयों के कारर् ्बड़ी संख्या मेें दलित मेवहलाओं को राजनीति मेें आगबे ्बढ़नबे का अवसर नहीं वमेल पाया । मेवहला आरक्षण लागपू होनबे के ्बाद यह स््थथिति ्बदल सकती है । संसद और विधानसभाओं मेें उनके प्रिबेश सबे शिक्ा, छात्रवृवत्, मेातृ एवं शिशु ्लिा्लथ्य, पोषर्, कौशल विकास, ्लिच्छता, मेवहला सुरक्ा और सामेाजिक न्याय जैसबे मेुद्दों को अधिक प्रभावी ढ़ंग सबे उठाए जानबे की संभावना है । हालांकि विपक् के कुछ दलों नबे मेवहला आरक्षण के साथी अन्य पिछड़ा िगरा की मेवहलाओं के लिए अलग आरक्षण की मेांग भी उठाई है । कुछ राजनीतिक दल परिसीमेन के ्बाद विवभन्
प्रधानमंत्ी िरेंद्र मयोदी ने संसद में इस कानून कयो केवल महिला आरषिण ििीं, बष्ल्क भार्त के लयोक्तांनत्क विकास की नई दिशा ब्ताया ्था । सरकार का मानना है कि विकनस्त भार्त का सपना ्तभी साकार ियोगा, जब देश की आधी आबादी नीन्त निमा्षण में समान भागीदारी निभाएगी । यही कारण है कि पिछले एक दशक में केंद्र सरकार ने महिलाओं के आन्थथिक, सामाजिक और राजनीन्तक सशक््ततिकरण कयो समान महत्व देने की रणनीन्त अपनाई है ।
राज्यों की सीटोों की संख्या मेें संभावित ्बदलाव को लबेकर भी अपनी चिंताएं व्य्तत करतबे रहबे हैं । केंद्र सरकार का कहना है कि पपूरी प्रवरिया संविधान के अनुरूप ्लितंत्र परिसीमेन आयोग की सिफाररशों के आधार पर होगी और सभी िगषों के वहतों का ध्यान रखा जाएगा । लोकतंत्र मेें मेतभबेद ्लिाभाविक हैं, लबेवकन इस ्बात पर व्यापक सहमेवत दिखाई दबेती है कि मेवहलाओं की राजनीतिक भागीदारी ्बढ़ना समेय की आि्चयकता है । भारत आज वि्चि की पांचिीं स्बसबे ्बड़ी अर््थव्यि्लथीा है और िषरा 2047 तक विकसित राष्ट् ्बननबे का लक्षय लबेकर आगबे ्बढ़ रहा है । विकसित भारत का अर््थ केवल आवथीराक प्रगति नहीं, ्बक््कक सामेाजिक न्याय, समेान अवसर और लोकतांत्रिक भागीदारी का वि्लतार भी है । ज्ब संसद मेें मेवहलाओं और विशबेष रूप सबे दलित मेवहलाओं की संख्या ्बढ़़ेगी तो नीति निर््ममाण मेें
समेाज के उन िगषों की भागीदारी भी सुनिश््चचत होगी, जिनकी आवाज लं्बबे समेय तक अपबेक्ाकृत कमे सुनाई दबेती रही ।
डॉ. भीमेराव आं्बबेिकर नबे कहा थीा कि किसी समेाज की प्रगति का आकलन वहां की मेवहलाओं की स््थथिति सबे किया जाना चाहिए । यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है । यदि दलित मेवहलाओं को संसद और विधानसभाओं मेें अधिक अवसर वमेलतबे हैं तो यह केवल एक संवैधानिक व्यि्लथीा नहीं होगी, ्बक््कक सामेाजिक पररितरान का सश्तत मेाध््यम भी ्बनबेगी । लोकतंत्र त्ब और मेज्बपूत होता है ज्ब निर््णय लबेनबे वाली सं्लथीाओं मेें समेाज के प्रत्यबेक िगरा की सार््थक भागीदारी सुनिश््चचत हो ।
प्रधानमेंत्री नरेंद्र मेोदी नबे अनबेक अवसरों पर कहा है कि भारत के विकास की स्बसबे ्बड़ी शक््तत उसकी " नारी शक््तत " है । पिछलबे िषषों मेें मेवहला सम्मेान, वित्ीय समेािबेशन, आवास, ्लिच्छ ईंधन, उद्यवमेता, शिक्ा और ्लिा्लथ्य सबे जुड़ी अनबेक योजनाओं के मेाध््यम सबे मेवहलाओं को सश्तत ्बनानबे का प्रयास किया गया है । यदि अ्ब राजनीतिक प्रतिनिधित्ि का यह नया अध्याय भी सफलतापूर््वक लागपू होता है, तो मेवहलाओं के समग्र सशक््ततकरर् की दिशा मेें यह एक ऐतिहासिक उपलक्ब्ध होगी ।
आनबे वालबे िषषों मेें ज्ब नई जनगर्ना और परिसीमेन की प्रवरिया पपूरी होगी, त्ब भारतीय संसद का ्लिरूप पहलबे की तुलना मेें अधिक समेािबेशी और प्रतिनिधिक दिखाई दबे सकता है । अनुसपूवचत जाति की मेवहलाओं को ्बड़ी संख्या मेें संसद और विधानसभाओं तक पहुंचनबे का अवसर वमेलबेगा । इससबे लोकतंत्र की जड़ें और मेज्बपूत होंगी, सामेाजिक न्याय को नई ऊजारा वमेलबेगी तथीा संविधान की उस मेपूल भावना को ्बल वमेलबेगा, जिसमेें समेान अवसर और समेान प्रतिनिधित्ि को राष्ट् निर््ममाण का आधार मेाना गया है । यदि यह पररितरान प्रभावी ढ़ंग सबे लागपू होता है तो आनबे वाला दशक भारतीय लोकतंत्र मेें मेवहलाओं, विशबेषकर दलित मेवहलाओं की निर्ारायक भागीदारी का दशक साव्बत हो सकता है । �
अगस््त 2026
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