August 2026_DA | Página 14

सना्ति संस्ककृन्त

है । इस अभियान का शुभारंभ गुरु पपूवर्रामेा के अवसर पर उनकी जन््मस््थली सीर गोिधरानपुर( काशी) सबे हो चुका है । अ्ब यह अभियान मेाघी पपूवर्रामेा( 1 फरवरी) तक पपूरबे दबेश मेें निरंतर चलबेगा । इस अवधि मेें सामेाजिक समेरसता सम््ममेलन, विचार गोक्ष्ठयां, जनसंवाद, सां्लकृवतक आयोजन, कलश यात्राएं और समेाज के विवभन् िगषों को जोड़नबे वालबे कायरारिमे आयोजित किए जाएंगबे ।
इस अभियान का स्बसबे भावनात््मक और प्रतीकात््मक पक् है संत रविदास जन््मस््थली की पवित्र मेार्ी । काशी की इस मेार्ी को 131 कलशों मेें भरकर उत्र प्रदबेश के 98 संगठनात््मक वजलों, दबेश के 27 राज्यों और छह संगठनात््मक क्षेत्रों के लिए रवाना किया गया है । आनबे वालबे मेहीनों मेें यही कलश गांव- गांव, ्ब्लती-्ब्लती और नगर-नगर पहुंचेंगबे । वहां पपूजन के साथी संत रविदास के विचारों पर संवाद होगा और सामेाजिक समेरसता का संदबेश जन-जन तक पहुंचाया जाएगा । यह केवल वमेट्ी का प्रवाह नहीं, ्बक््कक विचारों का राष्ट्ीय प्रसार है ।
वारार्सी मेें आयोजित उद्घार्न समेारोह नबे इस अभियान को राष्ट्ीय पहचान दी । भाजपा के राष्ट्ीय अध्यक् नितिन न्बीन, उत्र प्रदबेश के मेुख््यमंत्री योगी आदित्यनाथी, प्रदबेश अध्यक् पंकज चौधरी, राष्ट्ीय मेहामेंत्री तरुर् चुग, प्रदबेश मेहामेंत्री संगठन धर््मपाल सिंह, अनुसपूवचत जाति मेोचारा के राष्ट्ीय अध्यक् डॉ. लाल सिंह आयरा, राज््यमंत्री असीमे अरुर्, हंसराज वि्चिकमेारा सहित अनबेक जनप्रतिनिधि, संत समेाज और हजारों श्रद्धालुओं की उपस््थथिति नबे यह ्लपष््ट

सं्त शिरयोमणि गुरु रविदास— एक प्रेरक व्यष्क््तत्व

सं्त शिरयोमणि गुरु रविदास का जन््म उत्तर प्रदेश के वाराणसी ष्स््थ्त सीर गयोवि्षिपुर में माना जा्ता है । 15वीं श्ताब्दी के महान सं्त, समाज सुधारक और निगु्षण भक््तति आंदयोलन के प्रमुख स््तंभ के रूप में उन्दिोंने भार्तीय समाज कयो नई वैचारिक दिशा प्रदान की । उन्दिोंने जान्त-भेद, छुआछू्त और सामाजिक ऊंच-नीच का प्रखर विरयोि कर्ते हुए मानव्ता, समाि्ता, सामाजिक समरस्ता और श्रम की गरिमा कयो जीवन का मूल आधार ब्ताया । उनका मानना ्था कि मनु्टय की श्रेष््ठ्ता उसके जन््म से ििीं, बष्ल्क उसके कम्ष और चररत् से नििा्षरर्त ियो्ती है । सं्त रविदास की आध्याष्त्मक और सामाजिक चे्तिा का प्रभाव इ्तिा व्यापक रहा कि उनके अनेक पद गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकनल्त किए गए । उनका प्रनसद् वचन " मन चंगा ्तयो क्ठौ्ती में गंगा " आज भी आं्तरिक पवित्रता, सादगी और सच्ी भक््तति का कालजयी संदेश माना जा्ता है ।
उनका आदश्ष " ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन कयो अन्न..." एक ऐसे समाज की कल्पिा प्रस््ततुत कर्ता है, जहां सभी कयो समान अवसर, सम्माि और न्दयाय मिले । यही कारण है कि छह श्ताष्ब्दयों बाद भी सं्त रविदास के विचार सामाजिक समरस्ता और रा्टट् निमा्षण के लिए
समान रूप से प्रेरणादायी बने हुए िैं ।
कर दिया कि यह आयोजन केवल एक वतवथी विशबेष का कायरारिमे नहीं, ्बक््कक एक िषरा तक चलनबे वाला सामेाजिक अभियान है ।
राष्ट्ीय मेहामेंत्री तरुर् चुग नबे इस अवसर पर कहा कि संत रविदास का संदबेश किसी एक समेाज तक सीवमेत नहीं है । उन्होंनबे पपूरबे वि्चि को समेानता, मेानवता और सामेाजिक समेरसता का मेागरा दिखाया । उनकी जन््मस््थली की पावन मेार्ी को दबेशभर तक पहुंचाना भारत की सां्लकृवतक एकता को सश्तत ्बनानबे का प्रयास है ।
संत रविदास नबे ऐसबे समेय मेें सामेाजिक
चबेतना का दीप जलाया, ज्ब जाति व्यि्लथीा कठोर रूप धारर् कर चुकी थीी । उन्होंनबे कहा कि मेनुष्य का मेपू्कय जन््म सबे नहीं, कर््म सबे तय होता है । उन्होंनबे श्रमे को सम्मेान दिया, सबेिा को धर््म मेाना और प्रबेमे को समेाज का आधार ्बनाया । उनका प्रसिद्ध वचन " मेन चंगा तो कठौती मेें गंगा " केवल आध्याक्त्मेक संदबेश नहीं, ्बक््कक सामेाजिक दशरान भी है । यह ्बताता है कि पररितरान ्बाहर सबे नहीं, भीतर सबे शुरू होता है ।
उनकी क्कपना का समेाज ऐसा थीा जहां किसी के साथी जन््म या पबेशबे के आधार पर
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