सना्ति संस्ककृन्त
भबेदभाव न हो । उनका प्रसिद्ध पद—" ऐसा चाहपूं राज मैैं, जहां वमेलबे स्बन को अन् "— आज भी सामेाजिक न्याय और समेािबेशी विकास की अवधारर्ा को अभिव्य्तत करता है । यही कारर् है कि उनके विचार सीमेाओं मेें नहीं ्बंधबे । उनके पद गुरु ग्रंथ सावह्ब मेें ्लथीान पातबे हैं और दबेश-विदबेश मेें करोड़ों लोग उन्हें श्रद्धा सबे स््मरर् करतबे हैं ।
भक््तत आंदोलन नबे भारत को केवल आध्याक्त्मेक ऊजारा नहीं दी, ्बक््कक सामेाजिक पररितरान का मेागरा भी दिखाया । क्बीर नबे पाखंड पर प्रहार किया, गुरु नानक नबे मेानवता का संदबेश दिया और संत रविदास नबे सामेाजिक समेानता को जन-आंदोलन का ्लिरूप दिया । आज विकसित भारत के संक्कप के साथी ज्ब सामेाजिक समेरसता की आि्चयकता और अधिक मेहसपूस की जा रही है, त्ब संत रविदास के विचार नई ऊजारा प्रदान करतबे हैं ।
भाजपा नबे इसी सोच के साथी जयंती िषरा को कायरारिमेों की श्रृंखला तक सीवमेत नहीं रखा है । राज्य और जिला ्लतर पर कायराशालाएं आयोजित की गईं । अ्ब गांिों, ्बक््लतयों, नगरों और सामेाजिक सं्लथीाओं तक व्यापक संपक्क अभियान चलाया जा रहा है । अनुसपूवचत जाति मेोचारा, ्लथीानीय संगठन, संत समेाज और सामेाजिक कायराकतारा वमेलकर आनबे वालबे मेहीनों
मेें हजारों कायरारिमे आयोजित करेंगबे । इसका उद्देश््य केवल श्रद्धांजलि दबेना नहीं, ्बक््कक समेाज को जोड़ना है ।
वारार्सी मेें आयोजित समेीक्ा ्बैठकों मेें कलश यात्रा, जनसभाओं, संत समेाज की भागीदारी, सां्लकृवतक कायरारिमेों और जनसंवाद की वि्लतृत रूपरबेखा तैयार की गई । संगठन और प्रशासन के ्बीच समेन्िय ्लथीावपत कर यह सुनिश््चचत किया गया कि अभियान दबेश के हर वह्लसबे तक पहुंचबे ।
भारत आज दुनिया की स्बसबे तबेज़ी सबे आगबे
्बढ़ती अर््थव्यि्लथीाओं मेें शावमेल है, लबेवकन सामेाजिक समेरसता उसकी स्बसबे ्बड़ी शक््तत है । आवथीराक विकास तभी सार््थक होगा ज्ब समेाज का प्रत्यबेक िगरा सम्मेान और समेान अवसर के साथी आगबे ्बढ़़े । संत रविदास का दशरान इसी सोच को मेज्बपूत करता है । इसलिए उनकी 650िीं जयंती केवल अतीत का स््मरर् नहीं, ्बक््कक भविष्य के भारत की सामेाजिक दिशा का भी संकेत है ।
काशी सबे निकली यह समेरसता यात्रा अ्ब दबेशभर मेें फैल चुकी है । आनबे वालबे मेहीनों मेें ज्ब जन््मस््थली की पावन मेार्ी लाखों लोगों तक पहुंचबेगी, त्ब उसके साथी संत रविदास का वह संदबेश भी पहुंचबेगा जिसनबे सवदयों पहलबे समेाज को नई दिशा दी थीी— मेानवता ही स्बसबे ्बड़ा धर््म है, समेरसता ही स्बसबे ्बड़ी शक््तत है और समेानता ही स्बसबे ्बड़ा सामेाजिक आदशरा है ।
मेाघी पपूवर्रामेा( 1 फरवरी) तक चलनबे वाला यह राष्ट्ीय अभियान केवल एक जयंती समेारोह नहीं, ्बक््कक भारत की संत परंपरा, सामेाजिक चबेतना और सां्लकृवतक एकात््मता का उत्सि है । यदि इस अभियान सबे समेाज मेें संवाद ्बढ़ता है, भबेदभाव कमे होता है और नई पीढ़ी संत रविदास के विचारों सबे जुड़ती है, तो यही उनके प्रति स्बसबे सच्ची श्रद्धांजलि होगी । �
अगस््त 2026
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