August 2026_DA | 页面 12

कवर स््टटोरी

सत्ता के खेल कता एक प्रायोजित षड़़् ययंत्र

द लित-मेुस््ललिम गठजोड़ के प्रयास

मेें दवलतों को तो समेाजिक रूप सबे पीवड़त ्बताया जा रहा है, किंतु दवलतों की इस परिस््थथिति के पा्चिरा मेें वरियाशील शक््ततयों को छुपा लिया जाता है । ज्बवक इसके लिए वा्लतविक रूप सबे मेध्यकालीन अर्ब के आरिमेर्कारी विदबेशी मेुस््ललिम आरिांता ही जिम््ममेदार है । वैसबे दबेखा जाए तो, आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक प्रवरिया मेें दलित नबेतृत्ि द्ारा तथीाकवथीत उच्चिगटीय जावतयों की आलोचना को अपनी राजनीति का आधार ्बनाए हुए है । दवलतों के सामेाजिक एवं आवथीराक विकास के मेपूल अवरोधकों को दपूर करनबे के ्बजाए वसफ्क सत्ा पर अपनी पकड़ को ्बनाए रखना इन नबेताओं की प्राथीवमेकता है । हालांकि यह सही है कि हिंदपू धर््म मेें कई रूवढ़यों और कुरीतियां समेय के साथी अपना घर ्बनानबे मेें सफल रहीं और व्यापक रूप सबे ब्ाह्मर् जाति के िचरा्लि सं्बंधी आचार-व्यिहार का साकार रूप दिखाई दबेता है । मेनुवाद और ब्ाह्मर्िाद जैसबे शब्द दलित राजनीति की सफलता के लिए दलित नबेताओं द्ारा नियवमेत रूप सबे प्रयोग किए जातबे हैं । लबेवकन कोई भी ऐसा दलित नबेता सामेनबे नहीं आया, जिसनबे सामेाजिक समेरसता के लिए कोई कामे किया हो, ्बक््कक अधिकतर दलित नबेता उच्च वर््ण के हिंदुओं को दवलतों के पिछड़़ेपन का कारर् ्बतातबे हैं ।
आधुनिक भारत की राजनीति मेें डॉ. ्बी. आर. अं्बबेिकर के मेहान योगदान की चचारा न करके, उनके द्ारा किए गए संघषषों को हिंदुत्ि विरोध का रूप दबेकर तथीाकवथीत दलित नबेताओं द्ारा अपनबे- अपनबे दलों के लिए दवलतों को लुभानबे का कामे किया जा रहा है । भारतीय राजनीति मेें दवलतों की
वर््तमान स््थथिति के अवलोकन सबे यह भी पता चलता है कि दवलतों की वर््तमान स््थथिति पर ध्यान दबेनबे की जगह, विवभन् राजनीतिक दल अपनी ्लिाथीरा सिद्धि के लिए दवलतों का उपयोग कर रहबे हैं । दलित क्कयार् का दावा करनबे वालबे राजनीतिक दल और दलित नबेताओं के पास इस ्बात का कोई जवा्ब शायद नहीं होगा कि ्लितंत्रता के ्बाद सबे लगातार दबेश मेें दलति क्कयार् और गरी्बी हर्ाओ के नारबे लगाकर क्कयामेकारी कदमे उठानबे के दािबे तो खपू्ब किए गए, पर कई दशक ्बीत जानबेके ्बाद भी दलित अभी भी ्तयों अपनबे जीवन-स््थथिति को सुधारनबे के लिए भर्क रहबे हैं ।
दवलतों की राजनीति करनबे वालबे अधिकांश नबेता और राजनीतिक दलों नबे कभी भी सामेाजिक समेरसता के लिए कामे नहीं किया । कई वह्लसों मेें ्बंऱ्े दलित नबेता वसफ्क अपनबे व्यक््ततगत ्लिाथीरा मेें ऐसबे डू्ब गए कि उनका लक्षय वसफ्क अपनी ओर अपनबे परिवार की आवथीराक स््थथिति को ्बबेहतर और ्बबेहतर ्बनानबे पर ही केंद्रित रहा । यही वजह है कि विगत छह दशकों के दौरान दलित िगरा सबे निकलबे तमेामे नबेताओं के ्बावजपूद दलित समेाज मेें कोई सकारात््मक पररितरान नहीं आया ।
दलित समेाज को भ्रमे मेें रखकर अपनबे ्लिाथीरा
सिद्ध करनबे मेें जुऱ्े दलित नबेताओं को यह ्बात समेझ मेें ही नहीं आई कि मेुस््ललिम और ब्रिटिश चिंतकों नबे प्रभावित आवथीराक और सामेाजिक मेानसिकता का पहला और अंवतमे लक्षय भारतीय हिंदपू समेाज के अंदर सुनियोजित और षड़यंत्र के तहत दलित ्बना दिए गए एक ्बड़़े िगरा को सनातन सं्लकृवत सबे दपूर करना थीा, जिससबे वृहत्र सनातन सं्लकृवत को खंवड़त किया जा सके । उनका ऐसा मेानना थीा कि दवलतों का हितपोषर् केवल गैर-हिंदपू मेानसिकता के लोग कर सकतबे हैं । इसके लिए हिंदपू धर््म ग्ंथीों मेें भारी मेात्रा मेें अवििबेकपपूर््ण एवं अतावक्कक विषयों का सामेायोजन षड़़ंयत्रपूर््वक किया गया । वर््तमान मेें स््थथिति यह है कि हिंदपू धर््म को ही दवलतों के पिछड़़ेपन के कारर् के रूप मेें प्रचारित किया जा रहा है । ऐसबे तत्िों को विगत ढ़ाई हजार िषषों के ऐतिहासिक कुचरि सबे कोई लबेना-दबेना नहीं है । इसका मेपूल कारर् उनका वसफ्क अपनबे वहतों के लिए कामे करना भी कहा जा सकता है । इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि दलित िगरा के अधिकांश नेतोों के साथी ही सामेान्य िगरा के नबेताओं नबे भी दवलतों और दलित राजनीति को मेहज खबेल की ि्लतु ्बना दिया । �
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अगस््त 2026