August 2026_DA | Seite 11

कवर स््टटोरी

और वद्कली मेें ्बड़ी संख्या मेें निवास करता है । ऐतिहासिक रूप सबे इस समेुदाय को व्यापक चमेार समेुदाय की एक प्रमेुख शाखा मेाना गया है । समेय के साथी सामेाजिक पररक््लथीवतयों और आत््मपहचान के आधार पर ' जार्ि ' नामे भी व्यापक रूप सबे प्रचलित हुआ । औपवनिबेवशक काल और सामेाजिक जागरर् ्बीसिीं शताब्दी के प्रारंभ मेें चर््मकार समेुदाय मेें सामेाजिक सुधार और आत््मसम्मेान का आंदोलन तबेज हुआ । िषरा 1920 मेें प्रकाशित प्रो. डब्लपू एस बिग्रस की पु्लतक The Chamars मेें चर््मकार जाति का उ्कलबेख तत्कालीन सामेाजिक संदभरा मेें वमेलता है । यह पु्लतक उस समेय की सामेाजिक संरचना को समेझनबे का एक ऐतिहासिक स्ोत मेानी जाती है, हालांकि औपवनिबेवशक दृष््टटिकोर् सबे लिखी गयी एक पु्लतक है ।
इसी काल मेें चर््मकार जार्ि समेाज नबे अपनी अलग पहचान ्लथीावपत करनबे के लिए संगठन ्बनाए । जार्ि मेहासभा जैसी सं्लथीाओं नबे शिक्ा, सामेाजिक सुधार और आत््मसम्मेान को ्बढ़ािा दिया ।
दलित ईसाइयों की स््थथिति: धमेाांतरर् के ्बाद भी सामेाजिक चुनौतियाँ ्बरकरार
भारत मेें ईसाई समेुदाय की सामेाजिक संरचना पर हुए विवभन् अध्ययनों के अनुसार, दबेश की लगभग 2.5 करोड़( 25 वमेवलयन)
ईसाई आ्बादी मेें 70 प्रतिशत सबे अधिक लोग दलित पृष्ठभपूवमे सबे आतबे हैं । अनुमेानतः इनकी संख्या लगभग 1.9 करोड़ है । इस प्रकार दलित ईसाई भारत की कुल दलित आ्बादी का लगभग 9 – 10 प्रतिशत वह्लसा मेानबे जातबे हैं । यही कारर् है कि दलित ईसाइयों सबे जुड़़े सामेाजिक और नीतिगत प्रश्न लं्बबे समेय सबे सािराजनिक विमर््श का विषय ्बनबे हुए हैं ।
वैक््चिक ्लतर पर भारत की छवि धपूवमेल करनबे का प्रयास
दबेश मेें अ्ब तक कई आंदोलन हुए हैं यहां तक कि किसान आंदोलन की चचारा वैक््चिक सतर पर हुई लबेवकन सीजबेपी के आंदोलन मेें खासतौर पर भारत की छवि अंतरराष्ट्ीय ्लतर पर खरा्ब करनबे का प्रयास किया गया । दबेश की तुलना अन्य पड़ोसी राज्यों के ्बदहाल अि्लथीा सबे की गई, जैसा आंदोलन नबेपाल, ्बांग्लादबेश और अफगावन्लतान मेें हुआ । दबेश मेें वरिश््चचन वमेशनरी किसी भी स््थथिति मेें यह प्रमेावर्त करना चाहती रही है कि यहां के युवाओं की आवाज को द्बाया जा रहा है । उन्हें अपना अधिकार नहीं दिया जा रहा है । लोकतांत्रिक व्यि्लथीा ध्ि्लत हो रही है । हालांकि यह प्रयास उनकी असफल रही ।
यदि यह मेान लिया जाए कि किसी राजनीतिक दल या उसके समर््थकोों द्ारा आयोजित आंदोलन मेें कुछ असामेाजिक और
हिंसक तत्िों नबे प्रिबेश कर उसबे अराजक दिशा दबेनबे का प्रयास किया, तो ऐसी स््थथिति मेें सरकार का प्राथीवमेक दायित्ि कानपून-व्यि्लथीा, संवैधानिक सं्लथीाओं और आमे नागररकों की सुरक्ा सुनिश््चचत करना होता है । समेय रहतबे प्रशासन द्ारा की गई काररािाई व्यापक अराजकता और राष्ट्ीय सं्लथीानों को संभावित क्वत सबे ्बचानबे के उद्देश््य सबे दबेखी जा सकती है । साथी ही, लोकतांत्रिक व्यि्लथीा मेें यह भी अपेक्षित है कि विपक् जनभावनाओं का प्रतिनिधित्ि करतबे हुए हिंसा और तोड़फोड़ सबे ्लपष््ट दपूरी ्बनाए तथीा वैध मेांगों के समेथीरान और अवैध कृत्यों के विरोध के ्बीच ्लपष््ट रबेखा खीचें । लोकतंत्र तभी सुदृढ़ होता है ज्ब सरकार कानपून के शासन का पालन करबे, विपक् जिम््ममेदार आचरर् करबे और आंदोलन संविधान की मेयारादाओं एवं शांतिपपूर््ण तरीकों के भीतर संचालित हों ।
्बहरहाल, इस आंदोलन मेें जिन शक््ततयों का उपयोग किया गया यह साव्बत हो चुका है । ऐसबे समेय मेें आज भारत वि्चि का स्बसबे ्बड़ा लोकतंत्र होनबे के साथी-साथी वि्चिगुरु ्बननबे की दिशा मेें भी अग्सर है । ऐसबे समेय मेें हमेें विरोध की भी ऐसी सं्लकृवत विकसित करनी होगी जो वि्चि के सामेनबे अनुकरर्ीय उदाहरर् प्र्लतुत करबे । हमेारबे आंदोलन व्यि्लथीा को तोड़नबे के नहीं, व्यि्लथीा को ्बबेहतर ्बनानबे के मेाध््यम बनेें । �
अगस््त 2026
11