August 2026_DA | 页面 10

कवर स््टटोरी

आजाद जार्ि समेाज सबे आतबे हैं उन्होंनबे इस आंदोलन मेें आकर इस आग मेें घी का कायरा किया । चंद्रशबेखर का धमेारान्तरित जार्ि समेाज मेें स्बसबे ज्यादा प्रभाव है । इसके भी हिंदपू होनबे पर शंका ही किया जाता है । कुछ लोग उसबे भी धमेारान्तरित दलित ही कहतबे हैं । जिसनबे इस आंदोलन मेें आकर अपनी भपूवमेका और ्बढ़ा दी ।
यह कोई पहला अवसर नहीं है कि जार्ि समेाज का इसके पहलबे भी उपयोग किया गया है । कह सकतबे हैं कि करी्ब दो सौ िषषों सबे इनका उपयोग भारत विरोधी गतिविधि मेें किया जाता रहा है । 1872 मेें प्रकाशित पु्लतक ' हिंदपू ट्ाईन्स एंड कास््ट इन ्बबेनारस ' प्रो. एमे ए शबेरिंग द्ारा लिखित पु्लतक मेें इसबे दबेखा जा सकता है ।
जार्ि समेाज का सामेाजिक और ऐतिहासिक अध्ययन गंभीरता सबे किए जानबे की आि्चयकता है । औपवनिबेवशक काल के कुछ द्लतािबेजों और िषरा 1920 मेें प्रकाशित दी चमेासरा प्रो. डब्लपू. एस. विग्स द्ारा लिखित पु्लतक मेें भी जार्ि समेुदाय के सामेाजिक इतिहास और पहचान का उ्कलबेख वमेलता है ।
भारत का सामेाजिक इतिहास अनबेक विषमेताओं और विविध अनुभिों सबे वनवमेरात है । विवभन् समेुदायों की सामेाजिक पहचान, उनके संघषरा और समेय के साथी हुए पररितरानों को समेझनबे के लिए ऐतिहासिक द्लतािबेज और समेकालीन शोध मेहत्िपपूर््ण स्ोत मेानबे जातबे हैं । इसी संदभरा मेें िषरा 2014 मेें प्रभात प्रकाशन द्ारा पु्लतक ' हिंदपू चर््मकार जाति ' का उ्कलबेख सामेाजिक इतिहास के अध्ययन मेें किया जाता है ।
यह पु्लतक तत्कालीन जार्ि चमेार समेुदाय के सामेाजिक जीवन, उपसमेपूहों, धावमेराक मेान्यताओं और रीति-रिवाजों का विवरर् प्र्लतुत करती है । इसमेें विवभन् क्षेत्रों मेें प्रचलित उपजावतयों और सामेाजिक पहचान का भी उ्कलबेख वमेलता है । हालांकि, यह ध्यान रखना आि्चयक है कि यह एक समे-सामेवयक अध्ययन है, जिसबे वर््तमान समेय के सामेाजिक और प्रशासनिक दृष््टटिकोर् सबे लिखा गया थीा ।
सीजेपी( CJP) से जुड़़े आंदयोलन में जाटिव समाज की भागीदारी कयो लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीन्तक षिेत्ों में चचा्ष ्तेज ियो गई है । कुछ सामाजिक काय्षक्ता्षओं और वक््ताओं का दावा है कि आंदयोलन के मध्य जाटिव समाज की उल्लेखनीय भागीदारी रही और समुदाय के एक वग्ष कयो भ्ामक सूचनाओं के आधार पर आंदयोलन से ियोड़ा गया ।
इसलिए इसके निष्कषषों को आधुनिक शोध और समेकालीन सामेाजिक अध्ययनों के साथी पढ़ना अधिक उचित मेाना जाता है ।
्बीसिीं शताब्दी के शुरुआती दशकों मेें उत्र भारत, विशबेषकर वर््तमान उत्र प्रदबेश के कुछ क्षेत्रों मेें जार्ि समेुदाय के ्बीच सामेाजिक पहचान और सम्मेानजनक सं्बोधन को लबेकर एक मेहत्िपपूर््ण आंदोलन भी विकसित हुआ । इस दौर मेें समेुदाय के भीतर संगठित प्रयास हुए और ' जार्ि ' पहचान को व्यापक सामेाजिक मेान्यता दिलानबे की पहल की गई । ्बाद के िषषों मेें इस आंदोलन नबे सामेाजिक जागरूकता और आत््मसम्मेान के विमर््श को नई दिशा दी ।
प्रो. डब्लपू. एस. वब्ग्स की पु्लतक ' दी चमेासरा ' उस समेय के व्यापक चमेार समेुदाय की विवभन् उपजावतयों और उनके सामेाजिक जीवन का उ्कलबेख करती है । उस दौर मेें उत्र भारत मेें जार्ि समेुदाय को भी इसी व्यापक सामेाजिक िगरा के संदभरा मेें दबेखा जाता थीा । हालांकि, यह
भी तथ्य है कि ्बीसिीं शताब्दी के शुरुआती दशकों मेें जार्ि समेाज नबे अपनी अलग सामेाजिक पहचान ्लथीावपत करनबे के लिए संगठित प्रयास शुरू किए । पु्लतक मेें जार्ि- चर््मकार जाति को हिंदपू समेाज सबे कार्नबे के षड़यंत्र के तहत प्रकाशित किया गया थीा । लगभग दो सौ िषषों तक वरिश््चचयन पंथी के रडार पर रहनबे के कारर् चमेार जाति संपपूर््ण भारत मेें लगभग 70 प्रतिशत धमेारान्तरित होकर वरिश््चचयन ्बन चुके हैं ।
चमेार जार्ि समेाज नबे शिक्ा, संगठन और सामेाजिक सुधार के मेाध््यम सबे अपनी स््थथिति मेज्बपूत करनबे का प्रयास किया । इस प्रवरिया मेें जार्ि मेहासभा जैसी सं्लथीाओं का गठन हुआ और समेुदाय नबे ्लियं को अलग सामेाजिक पहचान दबेनबे का आंदोलन भी चलाया । प्राचीन और मेध्यकालीन पृष्ठभपूवमे चमेार जार्ि समेुदाय उत्र भारत, विशबेषकर
उत्र प्रदबेश, राज्लथीान, मेध्य प्रदबेश, हरियार्ा
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अगस््त 2026