में बलपूर्वक योजित किये गए दृढ़ निशियी, धर्माभिमानी एवं सवाजभमानी हिनदू युद्धबंदी कालांतर में अपने ही समाज में असपृशय होते चले गए ।
विदेशी इसलाजमक आरिांताओं के उतपीडन के परिणामसवरूप गौरवशाली, सवाजभमानी हिनदुओं के समूह को कई जातिवगषों में बलपूर्वक परिवर्तित कराया गया । जिनहोंने किसी भी मूलय पर इसलाम को सवीकार नहीं किया, उनको असवच् कायषों में लगाकर भारतीय समाज में कई ऐसी जातियों को जनम दिया गया, जो समय बीतने के साथ देश में दलित जातियों के रूप में सामने आयी । इसलाम को पूर्णतः असवीकार करने वाले सवाजभमानी हिनदू समाज ने इसलाजमक आरिांताओं के कठोर और विककृत अतयािार को सैकडों वषषों तक सवीकार किया ।
विदेशी मुकसलम षड्ंत्र के तहत भारतीय
समाज में पैदा हुआ असपृशय वर्ग मुकसलम शासनकाल के बाद अंग्ेजी शासकों की सत्ा के लिए नया मोहरा बना और भारत में अपने शासन को चिरसथायी बनाने के लिए अंग्ेजों ने फूट डा. लो-राज करो की नीति अपनायी । अग्ेजों ने विदेशी मुकसलम आरिांताओं द्ारा भारी सं्या में में असपृशय बनाये गए लोगों के प्जत घजडयाली आंसू बहाये और उनके हितों के नाम पर, उनको हिनदू समाज से अलग करके ' दलित ' श्ेणी प्दान की । इस प्कार हिनदू समाज को अपमानित और विखंडित करने के अभिप्ाय से विदेशी मुकसलम आरिांताओं और विदेशी शासक अंग्ेजों ने रिमशः असपृसय और दलित नामक जाति संवगषों की रचना की और दलितों को अपने सवाथषों के लिए एक उपकरण
बना कर रख दिया ।
1935 की जनगणना में उठी धर्मान्तरित दलितों को आरक्षण देने की मांग
अंग्ेजी शासनकाल के दौरान अंग्ेजों ने अपने हितों को पूरा करने और अपनी सत्ा की आयु बढ़ाने के लिए दलित वर्ग का भरपूर उपयोग किया । 1935 के भारत सरकार अधिनियम की प्जरिया के दौरान, धर्मानतरित दलितों( दलित ईसाइयों और मुसलमानों) के लिए आरक्ण और ' डिप्ेसि ्लास ' का दर्जा बनाए रखने की मांग की गई थी । अंग्ेज शासकों को आभास को गया था कि यदि भारत की
हिनदू जनता एकमत होकर संगठित हो गयी
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