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कवर स्टोरी

तो उनहें देश छोडना ही होगा । इसीलिए उस समय के ततकालीन अंग्ेज शासकों ने देश की जनता को जाति और धर्म में बांटने के प्यास शुरू कर दिए । धयान देने लायक बिंदु यह है कि भारत सरकार अधिनियम-1935 में डिप्ेसि ्लास को ' अनुसूचित जाति ' में बदल दिया गया तथा 1936 में विभिन्न प्ांतों में अनुसूचित जाति की अलग सूचियां तैयार की गई । भारत सरकार अधिनियम-1935 के अनतग्मत अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों को लाए जाने का लाभ यह हुआ कि संघीय विधायिका तथा प्ांतीय विधानसभाओं में इनहें राजनीतिक प्जतजनजधतव मिल गया । साथ ही 1935 के अधिनियम ने औपनिवेशिक भारत में आरक्ण की नीति को वयवकसथत किया, जिसमें दलितों( अनुसूचित जातियों) को सरकारी नौकरियों में आरक्ण दिया गया ।
उधर 1932 के पूना पै्ि के बाद डा.. भीमराव आंबेडकर ने दलितों के सामाजिक उतथान के लिए उनहें हिंदू समाज से अलग, लेकिन समान अधिकार देने की वकालत की । 1935-36 के दौरान, डा. आंबेडकर ने बड़े
पैमाने पर धमाांतरण( विशेषकर सिख धर्म में) का विचार रखा, जिससे यह प्श्न उठा कि धर्म बदलने के बाद आरक्ण की कसथजत ्या होगी? 1936 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया( शिड्ूलि कासि) ऑर्डर ने ' अनुसूचित जाति ' की श्ेणी को केवल हिंदुओं तक सीमित कर दिया । इसका अर्थ था कि धर्म बदलने वाले दलितों को आरक्ण के लाभ से वंचित करने की शुरुआत उसी समय हो गई थी ।
सुनियोजित रूप से उठाई गई धर्मान्तरित दलितों को आरक्षण देने की मांग
डा. आंबेडकर द्ारा तैयार किए गए संविधान के तहत, अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू धर्म के मानने वालों तक ही सीमित था । लेकिन धर्मानतरित दलितों ने यह तर्क देना आरमभ कर दिया कि धर्म बदलने के बावजूद समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत बना रहता है, इसलिए उनहें आरक्ण मिलना चाहिए । यह मांग बाद में 1950 के राष्ट्पति आदेश द्ारा और सीमित कर दी गई, जिसमें आरक्ण को केवल
हिंदू, बाद में सिख( 1956) एवं बौद्ध( 1990) दलितों तक सीमित कर दिया गया । इसके बाद भी धमाांतरित दलितों को आरक्ण देने की मांग समय-समय पर सुनियोजित रूप से उठाई जाती रही । लेकिन देश के किसी भी प्धानमंत्री ने इस मांग पर धयान नहीं दिया और न ही सवीकार किया ।
जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग और धमाांतरित दलित
2004 में केंद्र में कांग्ेस के नेतृतव वाली यूपीए की सरकार का गठन होने के बाद पूर्व प्धानमंत्री मनमोहन सिंह ने मार्च 2005 में पूर्व मु्य नयायाधीश नयायमूर्ति रंगनाथ जमश् की अधयक्ता में ' राष्ट्ीय धार्मिक और भाषाई अलपसं्यक आयोग ' का गठन किया । आयोग को आरक्ण के संबंध में 50 प्जतशत की अधिकतम सीमा और अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किए जाने की रीतियों के संदर्भ में संवैधानिक( अनुसूचित जाति) आदेश- 1950 के पैरा-3 से संबंधित उच्चतम नयायालय और कुछ उच्च नयायालय में दाखिल की गई
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