रिट याचिकाओं में उठाए गए मुद्ों के संबंध में सिफारिशें प्सतुत करना था । लेकिन नयायमूर्ति रंगनाथ जमश् आयोग का मूल एजेंडा. धर्मानतरित दलितों को किसी भी प्कार से आरक्ण का लाभ दिलाना ही था । 18 दिसंबर 2009 को संसद के दोनों सदनों में आयोग की रिपोर्ट को प्सतुत किया गया ।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में की रिपोर्ट में ईसाई तथा इसलाम धर्म में धमाांतरित होने वाले दलितों के लिए अनुसूचित जाति आरक्ण प्दान करने की सिफारिश की । आयोग का तर्क था कि दलित ईसाइयों और मुसलमानों को एससी श्ेणी से बाहर रखना समानता की संवैधानिक गारंटी का उललंघन है तथा इन धमषों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है, जो जातिगत भेदभाव को असवीकार करते हैं । धर्मानतरित होने वाले दलितों को एससी श्ेणी का दर्जा नहीं देने के कारण वह सामाजिक-आर्थिक और शैजक्क रूप से पी्छे रह गए हैं तथा उनहें शिक्ा एवं रोजगार के अवसरों में आरक्ण तक पहुंच से वंचित किया गया है ।
असहमति नोट से ठन्डे बसते में गई रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट
एक तरफ रंगनाथ मिश्ा आयोग का पूरा लक्य धर्मानतरित दलितों को किसी भी प्कार एससी आरक्ण का लाभ दिलाना था, वहीं आयोग की आयोग की सदसय सचिव श्ीमती आशा दास ने दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को एससी दर्जा देने की राय से असहमति जताई । रिपोर्ट में आशा दास ने अपना डिसेंट नोट दिया और दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को एससी दर्जा न दिये जाने के कारण भी गिनाए । हालांकि आशा दास के डिसेंट नोट पर भी आयोग के अनय सदसयों डा. ्िर ताहिर महमूद, डा. ्िर अनिल विससन और डा. ्िर मोहिनदर सिंह ने एक और नोट लिखा, जिसमें आशा दास के डिसेंट नोट में दिए आधारों को रद् कर दिया गया लेकिन वह भी रिपोर्ट का हिससा है । बाद में आयोग की रिपोर्ट पर हुए विचार-विमर्श के बाद उसकी सिफारिशों को सवीकार नहीं किया गया ।
उच्चतम नयायालय ने सपष्ि कर दी आरक्ण
की अवधारणा
अब एक बार पुनः देश के सववोच्च नयायालय ने सपष्ि कर दिया है कि धमाांतरित दलितों को किसी भी कसथजत में आरक्ण का लाभ नहीं दिया जा सकता है । यह निर्णय आंध्र प्देश उच्च नयायालय के उस निर्णय पर भी मुहर है, जिसमें मतांतरण के साथ ही दलित वयक्त को मिलने वाला अनुसूचित जाति का दर्जा समापत हो जाता है ।
एक तरफ ईसाई और मुकसलम पंथ के नेता कहते हैं कि उनके पंथ में जाति जैसी कोई प्था नहीं है, वही दूसरी ओर दलित ईसाई और दलित मुकसलम जैसी अवधारणाएं पैदा करके दलित ईसाइयों एवं दलित मुकसलमों को आरक्ण की मांग के लिए लगातार उकसाया कर सामाजिक असंतुलन की कसथजत पैदा करने की चेष्टा की जा रही थी । फिलहाल यह निर्णय उन धर्मानतरित दलितों के लिए एक बड़ा झटका है, जो ईसाई पंथ अपनाने के बावजूद आरक्ण और अनय संवैधानिक लाभों की मांग निरंतर करते आ रहे थे । �
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