April 2026_DA | Page 29

में बाधा पड़ेगी । इसीलिए चातुव्मणय्म में अंतर्निहित सामाजिक और आर्थिक बंधनों को असवीकार करना आर्थिक नयाय के लिए पूर्व शर्त है और आर्थिक लोकतंत्र की सिद्धि के लिए एक अतयावशयक मद है ।
डा. आंबेडकर कहते हैं कि लोकतंत्र के लिए एक ' सार्वजनिक अंतःकरण '( पकबलक कलॉनशस) की आवशयकता होती है । उनहोंने एक जगह कहा है कि " हम लोग दजक्ण अफीका की बात करते हैं, परंतु मुझे मन-ही-मन आशिय्म होता है कि अफीका में भेदभाव के विषय में बोलते समय ्या हमें यह समरण रहता है कि अपने यहां गांव-गांव में एक दजक्ण अफीका है? यह सतय पररकसथजत है । खुद जाकर देखें तो समझ पाएंगे । इसका कारण है I अपने यहां सार्वजनिक अंतःकरण का अभाव । अनयाय से उतपीजडत
अलपसं्यकों को इस अनयाय से बचाने के लिए किसी से भी सहायता नहीं मिल पाती । इसीलिए रिांजतकारी प्वृजत्याँ पनपती हैं और लोकतंत्र के लिए खतरा उतपन्न हो जाता है ।"
इस प्कार सामाजिक और आर्थिक मदों में समान अवसर, बंधुभाव पर आधारित समाज वयवसथा, नयाय मिलने का विशवास और सार्वजनिक अंत: करण इन सब को डा. आंबेडकर सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र के लिए अतयावशयक पूर्व शततें मानते हैं, जो उनका सवप्न था । इस पृष्ठभूमि में िलॉ. आंबेडकर द्ारा प्सताजवत संवैधानिक प्ावधानों को परखना अतयंत आवशयक है । सवैधानिक सतर्कताएं 1947 में डा. आंबेडकर ने संविधान समिति को एक ज्ापन प्सतुत किया, जिनमें उनहोंने बताया कि अनुसूचित जातियों की सुरक्ा के लिए संविधान में ्या-्या प्ावधान होने आवशयक हैं । इस ज्ापन का शीर्षक था ' राष्ट् एवं अलपसं्यक '। इस ज्ापन में उनहोंने संसदीय लोकतंत्र को बरकरार रखने की आवशयकता पर बल देने के साथ यह भी सुझाव दिया कि संसद् को यह अधिकार न हो कि वह साधारण बहुमत से राष्ट् समाजवाद पर रोक लगाए, उसमें परिवर्तन करे या उसे निरसत कर दे, इसलिए राष्ट् समाजवाद का कार्यानवयन राष्ट् के संविधान के माधयम से ही होना चाहिए । डा. आंबेडकर की धारणा थी कि केवल ऐसा होने पर ही संसदीय लोकतंत्र बनाए रखने, समाजवाद की सथापना करने और तानाशाही से बचने के तीन लक्य प्ापत किए जा सकेंगे । बाद में संविधान समिति के समक् भाषण करते हुए उनहोंने कहा कि नया संविधान बनाने के दो धयेय थे-
-राजनीतिक लोकतंत्र का सवरूप जनकशित करना ।
-आर्थिक लोकतंत्र यही हमारा उद्ेशय है, ऐसा ऐलान करना । कोई भी सरकार सत्ा में हो, वह आर्थिक लोकतंत्र सथाजपत करने के लिए कटिबद्ध रहे, यह घोषित करना । इस प्कार आर्थिक लोकतंत्र की संकलपना भारत के संविधान में आरंभ ही से अंतर्भूत की गई थी ।
इस संकलपना को सपष्ि करते हुए डा. आंबेडकर कहते हैं, " लोगों का यह विशवास है कि आर्थिक लोकतंत्र अनेक प्कार से सथाजपत किया जा सकता है । कुछ लोग समझते हैं कि परम वयक्तवाद लोकतंत्र की सर्वश्ेष्ठ प्कार है, तो कुछ यह मानते हैं कि समाजवादी राष्ट् द्ारा ही लोकतंत्र प्ापत किया जा सकता है । आर्थिक लोकतंत्र की सथापना का एकमेव मार्ग सामयवाद ही है, ऐसा कुछ और लोगों का मत है । परंतु " एक तरल और प्वाही धारणा को जकडकर रखने के प्यास ठीक नहीं है । आर्थिक लोकतंत्र एक परिवर्तनशील संकलपना है, जो समय और पररकसथजत के साथ-साथ बदलती रहती है ।" इसीलिए आर्थिक लोकतंत्र की नींव रखने के लिए उनहोंने इसे राष्ट् के मार्गदर्शक सिद्धांतों के अंतर्गत संविधान में सकममजलत कराए जाने का आग्ह किया । राष्ट् के मार्गदर्शक सिद्धांतों का संविधान में समावेश आवशयक तो था, लेकिन आर्थिक लोकतंत्र की सथापना के लिए काफी नहीं, इसे डा. आंबेडकर अच्ी तरह समझते थे । इसीलिए संविधान को अपनाते समय किए गए अपने भाषण में उनहोंने कहा था-
" 26 जनवरी, 1950 को हम एक परसपर विरोधी सवरूप की जीवनप्णाली अपनाने जा रहे हैं । हमारे राजनीतिक जीवन में समता होगी, परंतु आर्थिक और सामाजिक जीवन में विषमता होगी । राजनीति में एक वयक्त एक मत है और प्तयेक मत का मूलय एक-सा है, यह हम सवीकार कर लेंगे; किंतु अपना सामाजिक ढाँचा कुछ ऐसा है कि सभी लोग समान हैं, यह हम सवीकार नहीं कर पाएँगे । कब तक हम ऐसा परसपर विरोधी जीवन जीते रहेंगे? कब तक हम अपने आर्थिक और सामाजिक जीवन में समानता को ठुकराते रहेंगे? यदि बहुत समय तक यह जारी रहे तो अपना राजनीतिक लोकतंत्र संकट में पड जाएगा । इस असंगति को यथाशीघ्र मिटाना होगा, वरना असमानता का शिकार वर्ग द्ारा राजनीतिक लोकतंत्र की इमारत को ही तहस-नहस कर दिया जाएगा ।"
( पुस्तक डा. आंबेडकर: आर्थिक विचार एवं दर्शन से साभार)
vizSy 2026 29