April 2026_DA | Page 28

जन्मदिन पर विशेष

सधन हो या निर्धन । और संभवतः सधनों की अपेक्ा निर्धनों की सं्या कहीं अधिक होती है । अगर हमने बहुतों की आवाज को निर्णायक नियु्त किया है तो ऐसा भी संभव है कि यदि अलपसं्यक ' सधन ' वर्ग सवेच्ा से अपने आप अपनी विशेष सुविधाएं नहीं छोड दे तो उसमें और समाज के निचले सतर के वर्ग में अंतर बढ़ता जाएगा, जिससे लोकतंत्र नष्ट होकर उसके सथान पर कुछ और ही खडा हो जाएगा । यदि आप विशव के अलग-अलग सथानों में लोकतंत्र के इतिहास का निरीक्ण करें तो यह ज्ात होगा कि इन सामाजिक शतषों की पूर्ति न होने के कारण वहां लोकतंत्र का विनाश हुआ है । इस संबंध में मेरे मन में रत्ीभर भी संदेह नहीं है ।"
वह विशव के अनय भागों में संसदीय लोकतंत्र की असफलता के कारणों की मीमांसा करते हुए
कहते हैं कि " अनुबंध करने की सवतंत्रता अनेक कारणों में से एक है । इस धारणा ने आगे चलकर एक पवित्रता प्ापत कर ली, जिसे सवतंत्रता के रूप में समर्थन प्ापत हुआ । न तो अनुबंध करनेवाले दोनों पक्ों की आर्थिक कसथजत और सौदा करने के सामर्थ्य को संसदीय लोकतंत्र ने विचार में लिया और न ही अनुबंध सवतंत्रता से इन दो पक्ों पर होने वाले परिणामों पर ही धयान देने का कष्ट किया । अनुबंध की सवतंत्रता से दुर्बल पक् को ठगने का सबल पक् को अवसर मिलता है, इसका भी ्याल उसने नहीं रखा । परिणामसवरूप, संसदीय लोकतंत्र ने सवतंत्रता को पुष्ट तो किया, लेकिन इसके साथ-साथ गरीब, दलित तथा वंचित लोगों की आर्थिक कठिनाइयों में वृद्धि की । अनेक देशों में सवतंत्रता की आशा जाग्त हुई । परंतु समता का महतव
समझने में वह असफल रहे तथा समता और सवतंत्रता का तालमेल नहीं बिठा पाए । इसीलिए सवतंत्रता समता पर हावी हो गई और लोकतंत्र एक ' फार्स ' बनकर रह गया ।'' सवतंत्रता के समान ही ' बंधुतव ' की कसथजत । डा. आंबेडकर के मतानुसार ' बंधुतव ' यह लोकतंत्र का दूसरा नाम है । अतएव सामाजिक अतयािार, जातीयता, बेगारी, दुवय्मवहार और असुरजक्तता, ये सब लोकतंत्र की सथापना को बाधा पहुंचाते हैं ।
' नयायशीलता का अभाव ' लोकतंत्र के मार्ग में एक और बाधा है, यह भी डा. आंबेडकर ने पहचाना था । उनके मतानुसार समाज यदि यथार्थ और आदर्श के बीच संतुलन बनाए रख सके तो नयायशीलता प्ापत की जा सकती है । यदि समाज यथार्थ को आदर्श मानने लगे( जैसे- अलग- अलग वगषों का अकसततव) तो नयाय के सिद्धांत
28 vizSy 2026