April 2026_DA | Página 14

जन्मदिन पर विशेष

विचार । ्या कोई कानून या संविधान दो या अधिक लोगों को भाईचारे के साथ रहना सिखा सकता है? ्या कोई कानून मजबूर कर सकता है कि हम दूसरे नागरिकों के सुख और दुख में साझीदार बनें और साझा सपने देखें? ्या इस देश में दलित उतपीडन पर पूरा देश दुखी होता है? ्या आदिवासियों की भूमि का जबरन अजधग्हण राष्ट्ीय चिंता का कारण हैं? दुख के क्णों में अगर नागरिकों में साझापन नहीं है, तो भूमि के एक टुकड़े पर बसे होने और एक झंिछे को जिंदाबाद कहने के बावजूद हम लोगों का एक राष्ट् बनना अभी बाकी है । राष्ट् बनने के लिए यह भी आवशयक है कि हम अतीत की कडवाहट को भूलना सीखें ।
अमूमन किसी भी बड़े राष्ट् के निर्माण के रिम में कई अजप्य घटनाएं होती हैं, जिनमें कई की श्ल हिंसक होती है और वे समृजतयां लोगों में साझापन पैदा करने में बाधक होती हैं । इसलिए आवशयक है कि विशेष रूप से विजेता समूह, उन घटनाओं को भूलने की कोशिश करे । राष्ट् जब लोगों की सामूहिक चेतना में है, तभी राष्ट् है । बाबा साहब चाहते थे कि भारत के लोग, तमाम अनय पहचानों से ऊपर, खुद को सिर्फ भारतीय मानें, राष्ट्ीय एकता ऐसे सथाजपत होगी । वर्तमान विवादों के आलोक में, बाबा साहब के राष्ट् संबंधी विचारों को दोबारा पढ़छे जाने और आतमसात किए जाने की आवशयकता है I
बाबा साहब ने कहा था कि अनूठछे हैं भारत के राष्ट्वादी और देशभ्त, भारत एक अनूठा देश है । इसके राष्ट्वादी एवं देशभ्त भी अनूठछे हैं । भारत में एक देशभ्त और राष्ट्भ्त वह वयक्त है जो अपने समान अनय लोगों के साथ मनुष्य से कमतर वयवहार होते हुए अपनी खुली आंखों से देखता है, लेकिन उसकी मानवता विरोध नहीं करती । उसे मालूम है कि उन लोगों के अधिकार अकारण ही छीने जा रहे हैं, लेकिन उसमें मदद करने की सभय संवेदना नहीं जगती । उसे पता है कि लोगों के एक समूह को सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया गया है, लेकिन उसके भीतर नयाय और समानता का बोध नहीं होता । मनुष्य और समाज को चोटिल
करनेवाले सैकडों निंदनीय रिवाजों के प्िलन की उसे जानकारी है, लेकिन वह उसके भीतर घृणा का भाव पैदा नहीं करते हैं । देशभ्त सिर्फ अपने और अपने वर्ग के लिए सत्ा का आकांक्ी होता है । मुझे प्सन्नता है कि मैं देशभ्तों के उस वर्ग में शामिल नहीं हूं । मैं उस वर्ग में हूं, जो लोकतंत्र के पक् में खडा होता है और जो हर तरह के एकाधिकार को धवसत करने का आकांक्ी है. हमारा लक्य जीवन के हर क्ेत्र ' राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ' में ' एक वयक्त-एक मूलय ' के सिद्धांत को वयवहार में उतारना है ।
19वीं सदी और 20वीं सदी के पहले दो
दशकों तक हुए सामाजिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि में बाबा साहब डा. आंबेडकर का सार्वजनिक जीवन में प्वेश भारतीय समाज में सामाजिक रिांजत के मार्ग को निर्णायक मोड देनेवाला महतवपूर्ण ऊर्जा स्ोत रहा है । डा. आंबेडकर प्खर चिंतक, कानूनविद और सामाजिक नयाय की लडाई के योद्धा मात्र नहीं रहे, अपितु उनकी वैचारिक दृष्टि में अनयाय का प्जतकार करने के साहस के साथ-साथ नैतिक पथ पर अविचल चलने की प्जतबद्धता भी दिखाई देती है, जो मूलयों की पहचान ढूंढ़ते समाज को दिशा दिखाती है । भारतीय समाज में विविधता भी है और विषमता भी । विविधता सवाभाविक होती है, परंतु
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