April 2026_DA | Page 13

मिलकर देखा जाए तो बाबा साहब के कायषों और योगदानों की सूची बेहद लंबी है I
लेकिन, इन सबको जोड कर बाबा साहब की जो समग् तसवीर बनती है, वह निससंदेह एक राष्ट् निर्माता की है । बाबा साहब का भारतीय राष्ट् कैसा है? ्या वह राष्ट् एक न्शा है, जिसके अंदर ढछेर सारे लोग हैं? ्या राष्ट् किसी झंिछे का नाम है, जिसे कंधे पर लेकर चलने से कोई राष्ट्वादी बन जाता है? ्या भूगोल ने पहाड और नदियों ने अपनी प्ाककृजतक सीमाओं से घेर कर जमीन के एक टुकड़े को राष्ट् का
रूप दे दिया है? या फिर, ्या हम इसलिए एक राष्ट् हैं कि हमारे सवाथ्म और हित साझा हैं? बाबा साहब का राष्ट् इन सबसे अलग है । धर्म, भाषा, नसल, भूगोल या साझा सवाथ्म को या फिर इन सबके समुच्चय को, बाबा साहब राष्ट् नहीं मानते । बाबा साहब का राष्ट् एक आधयाकतमक विचार है । वह एक चेतना है । हम एक राष्ट् हैं, ्योंकि हम सब मानते हैं कि हम एक राष्ट् हैं । इस अर्थ में यह किसी सवाथ्म या संकीर्ण विचारों से बेहद ऊपर का एक पवित्र विचार है । इतिहास के संयोगों ने हमें एक साथ जोडा है, हमारा
अतीत साझा है, हमने वर्तमान में साझा राष्ट् जीवन जीना तय किया है और भविष्य के हमारे सपने साझा हैं, और यह सब है इसलिए हम एक राष्ट् हैं । राष्ट् की यह परिकलपना बाबा साहब ने यूरोपीय विद्ान अननेसि रेनलॉन से ली है, जिनका 1818 का प्जसद्ध व्तवय‘ ह्ाि इज नेशन’ आज भी सामयिक दसतावेज है I
संविधान सभा में पू्छे गए तमाम प्श्नों का उत्र देने के लिए जब बाबा साहब 25 नवंबर, 1949 को खड़े होते हैं, तो वह इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारत सवतनत्र हो चुका है, लेकिन उसका एक राष्ट् बनना अभी बाकी है । बाबा साहब कहते हैं कि भारत एक बनता हुआ राष्ट् है । अगर भारत को एक राष्ट् बनना है, तो सबसे पहले इस वासतजवकता से रूबरू होना आवशयक है कि हम सब मानें कि जमीन के एक टुकड़े पर कुछ या अनेक लोगों के साथ रहने भर से राष्ट् नहीं बन जाता । राष्ट् निर्माण में वयक्तयों का मैं से हम बन जाना बहुत महतवपूर्ण होता है । वह चेतावनी भी देते हैं कि हजारों जातियों में बंिछे भारतीय समाज का एक राष्ट् बन पाना आसान नहीं होगा । सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में घनघोर असमानता और कडवाहट के रहते यह काम मुमकिन नहीं है । अपने बहुचर्चित, लेकिन कभी न दिए गए भाषण‘ एनिहिलेशन ऑफ कासि’ में बाबासाहब जाति को राष्ट् विरोधी बताते हैं और इसके विनाश के महतव को रेखांकित करते हैं । बाबासाहब की संकलपना का राष्ट् एक आधुनिक विचार है । वह सवतंत्रता, समानता और बंधुतव की बात करते हैं, लेकिन वह इसे पकशिमी विचार नहीं मानते । वह इन विचारों को फांजससी रिांजत से न लेकर, बुद्ध की शिक्ा या बौद्ध परंपरा से लेते हैं । संसदीय प्णालियों को भी वह बौद्ध भिक्ु संघों की परंपरा से लेते हैं ।
सवतंत्रता और समानता जैसे विचारों की सथापना संविधान में नियम-कानूनों के माधयम से की गई है । इन दो विचारों को मूल अधिकारों के अधयाय में शामिल करके इनके महतव को रेखांकित भी किया गया है । लेकिन इन दोनों से महतवपूर्ण या बराबर महतवपूर्ण है बंधुतव का
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