April 2026_DA | Page 15

विषमता नैसर्गिक नहीं है, इसलिए इस पर विचार आवशयक है ।
बाबा साहब के नैतिक साहस ने अपने समाज की विषमतामूलक वयवसथा का मात्र विरोध ही नहीं किया, उनहोंने इसके कारण, समाज और राष्ट्ीय एकता पर इसके दुष्प्भाव और सतय, अहिंसा तथा मानवता के विरुद्ध इसके सवरूप को भी उजागर किया । आधुनिक भारत के निर्माणकर्ताओं में डा. आंबेडकर की समाज पुनर्रचना की दृष्टि को मात्र वर्ण आधारित जाति वयवसथा के विरोध एवं अछूतोद्धार तक ही सीमित करके देखा जाता है, जो उनके साथ अनयाय है । जाति वयवसथा का विरोध एवं जाति
आधारित वैमनसय, छूआछूत का प्जतकार मधयकालीन संतों से लेकर आधुनिक विचारकों तक द्ारा किया गया, परंतु अधिकतर संतों, राष्ट्नायकों ने वेद एवं उपनिषद् की द‍ ृष्टि से सामाजिक पुनर्रचना के कार्य में सहयोग दिया, जबकि बाबा साहब ने महातमा बुद्ध के संघवाद एवं धमम के पथ से सवयं को जनदनेजशत किया I
गौतम बुद्ध का कथन‘ आतमदीपोभव’ को बोधिसतव डा. आंबेडकर ने अपने जीवन में न सिर्फ उतारा, बकलक इससे पूरे समाज के लिए नैतिकता, नयाय एवं उदारता का पथ आलोकित किया । बाबा साहब का मानना है कि जब हम किसी समुदाय या समाज में रहते हैं, तो जीवन
के मापदंड एवं आदशषों में समानता होनी चाहिए । यदि यह समानता नहीं हो, तो नैतिकता में पृथकता की भावना होती है और समूह जीवन खतरे में पड जाता है । यही चिंतन है, जिसके आधार पर उनका निष्कर्ष था कि हिंदू धर्म ने दलित वर्ग को यदि शसत्र धारण करने की सवतंत्रता दी होती, तो यह देश कभी परतंत्र न हुआ होता ।
बात शसत्र की ही नहीं, शासत्रों की भी है, जिनके ज्ान से वंचित कर हमने एक बड़े हिससे को अपनी भौतिक एवं आधयाकतमक संपदाओं से वंचित कर दिया और आज यह सामाजिक तनाव का एक प्मुख कारण बन गया है ।
डा. आंबेडकर जाति वयवसथा का जड से उनमूलन चाहते थे, ्योंकि उनकी तीक्ण बुद्धि देख पा रही थी कि हमने कर्म सिद्धांत को, जो वयक्त के मूलयांकन एवं प्गति का मार्गदर्शक है, भागयवाद, अकर्मणयता और शोषणकारी समाज का पोषक बना दिया है । उनकी सामाजिक नयाय की दृष्टि यह मांग करती है कि मनुष्य के रूप में जीवन जीने का गरिमापूर्ण अधिकार समाज के हर वर्ग को समान रूप से मिलना चाहिए और यह सिर्फ राजनीतिक सवतंत्रता एवं लोकतंत्र से प्ापत नहीं हो सकता । इसके लिए आर्थिक एवं सामाजिक लोकतंत्र भी चाहिए । एक वयक्त-एक वोट की राजनीतिक बराबरी होने पर भी सामाजिक एवं आर्थिक विषमता लोकतंत्र की प्जरिया को दूषित करती है, इसलिए आर्थिक समानता एवं सामाजिक भेदभाव विहीन जनतांत्रिक मूलयों के प्जत वे प्जतबद्धता का आग्ह करते हैं ।
डा. आंबेडकर की लोकतांत्रिक मूलयों में अटूट आसथा थी । वह कहते थे कि जिस शासन प्णाली से र्तपात किए बिना लोगों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में रिांजतकारी परिवर्तन लाया जाता है, वह लोकतंत्र है । वह मनुष्य के दुखों की समाकपत सिर्फ भौतिक व आर्थिक शक्तयों के आधिपतय से नहीं सवीकारते थे । डा. आंबेडकर ज्ान आधारित समाज का निर्माण चाहते थे, इसलिए उनका आग्ह था- ' जशजक्त बनो, संगठित हो और संघर्ष करो '। �
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