भाषाओं मेें छप चुका है । इसी भाषण मेें भारत मेें जाति प्र्था के उद््गम और विकास के बारे मेें विस्तार से बताया गया है । जाति के विनाश के बारे मेें उन्होंने लाहौर के जात-पाँत तोड़क मेंडल के लिए जो भाषण तैयार किया ्था, उसमेें भी इन विचारों को और पुख़़्ता किया गया है । जात-पाँत तोड़क मेंडल वाले रिांलतकारिता का
चोला तो धारण किए हुए ्थे, लेकिन वे जातिप्र्था के ज़हर के मेूल कारणों पर चचाणा से बचना चाहते ्थे । शायद इसीलिए उन्होंने डलॉ. अंबेडकर से आग्ह किया कि उस भाषण मेें कुछ बदलाव कर दें । लेकिन वह बदलाव के लिए राज़ी नहीं हुए । नतीजा यह हुआ कि उनका भाषण कैंसिल कर दिया गया । उस भाषण को एक किताब की शक्ि मेें छाप दिया गया और वही किताब अन्निहिलेशन ऑफ़ कास््ट, डलॉ. अंबेडकर के
राजनीतिक-सामेाजिक दिणान के बीजक के रूप मेें पूरी दुनिया मेें पहचानी जाती है ।
जाति के उद््गम और उसके विकास की व्याख्या के दौरान ही डलॉ. अंबेडकर ने जाति संस््था मेें मेनु की संभावित भूलमेका का विस्तार से वणणान किया है । मेनु के बारे मेें उन्होंने कहा कि अगर कभी मेनु रहे भी होंगे तो बहुत ही हिम््मती रहे होंगे । डलॉ. अंबेडकर का कहना है कि ऐसा कभी नहीं होता कि जाति जैसा शिकंजा कोई एक व्यल्क्त बना दे और बाक़ी पूरा समेाज उसको स्वीकार कर ले । उनके अनुसार इस बात की क्कपना करना भी बेमेतलब है कि कोई एक आदमेी क़ानून बना देगा और पीढ़ी- दर-पीढ़ी उसको मेानती रहेंगी । हाँ, इस बात की क्कपना की जा सकती है कि मेनु नामे के कोई तानाशाह रहे होंगे, जिनकी ताक़त के नीचे पूरी आबादी दबी रही होगी और वह जो कह देंगे, उसे सब मेान िेंगे और उन लोगों की आने वाली नस्िें भी उसे मेानती रहेंगी । उन्होंने कहा कि मैैं इस बात को ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि मेनु ने जाति की व्यवस््था की स््थापना नहीं की क्योंकि यह उनके बस की बात नहीं ्थी । मेनु के जन््म के पहले भी जाति की व्यवस््था कायमे ्थी । मेनु का योगदान बस इतना है कि उन्होंने इसे एक दािणालनक आधार दिया । जहां तक हिन्दू समेाज के स्वरूप और उसमेें जाति के मेह्त्व की बात है, वह मेनु की हैसियत के बाहर ्था और उन्होंने वर््तमान हिन्दू समेाज की दिशा तय करने मेें कोई भूलमेका नहीं निभाई । उनका योगदान बस इतना ही है उन्होंने जाति को एक धर््म के रूप मेें स््थालपत करने की कोशिश की ।
जाति का दायरा इतना बड़ा है कि उसे एक आदमेी, चाहे वह जितना ही बड़ा ज्ाता या शातिर हो, संभाल ही नहीं सकता । इसी तरह से यह कहना भी ठिीक नहीं होगा कि ब्ाह्मणों ने जाति की संस््था की स््थापना की । मेेरा मेानना है कि ब्ाह्मणों ने बहुत सारे ग़ित कामे किए हैं । लेकिन ऐसा कभी संभव ही नहीं ्था कि वह पूरे समेाज पर जाति व्यवस््था को ्थोप सकते । हिन्दू समेाज मेें यह धारणा आमे है कि जाति की संस््था का
आविष्कार शास्त्ों ने किया और शास्त् तो कभी ग़ित हो नहीं सकते । बाबासाहब ने अपने इसी भाषण मेें एक चेतावनी और दी ्थी कि उपदेश देने से जाति की स््थापना नहीं हुई ्थी और इसको ख़त््म भी उपदेश के ज़रिए नहीं किया जा सकता । यहां यह भी स्पष््ट कर देना ज़रूरी है कि अपने इन विचारों के बावजूद डलॉ. अंबेडकर ने समेाज सुधारकों के लख़िाफ़ कोई बात नहीं कही । ज्योलतबा फुले का वह हमेेशा सम्मेान करते रहे । हाँ, उन्हें यह पूरा विश्वास ्था कि जाति प्र्था को किसी मेहापुरुष से जोड़ कर उसकी तालक्कक परिणति तक नहीं ले जाया जा सकता ।
डलॉ. अंबेडकर के अनुसार हर समेाज का वगगीकरण और उप-वगगीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वगगीकरण के चलते वह ऐसे साँचों मेें फ़़िट हो जाता है कि एक-दूसरे वगणा के लोग इसमेें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं । यही जाति का शिकंजा है और इसे ख़त््म किए बिना कोई तरक़़्क़ी नहीं हो सकती । सच्ची बात यह है कि शुरू मेें अन्य समेाजों की तरह हिन्दू समेाज भी चार वगगों मेें बं्टा हुआ ्था । ब्ाह्मण, क्षलत्य, वैश्य और शूद्र । यह वगगीकरण मेूल रूप से जन््म के आधार पर नहीं ्था, यह कर््म के आधार पर ्था । एक वगणा से दूसरे वगणा मेें आवाजाही ्थी । लेकिन हज़ारों वषगों की निहित स्वा्थगों कोशिश के बाद इसे जन््म के आधार पर कर दिया गया और एक-दूसरे वगणा मेें आने-जाने की रीति ख़त््म हो गई । और यही जाति की संस््था के रूप मेें बाद के युगों मेें पहचाना जाने लगा । अगर आल्थथिक विकास की गति को तेज़ किया जाए और उसमेें सार््थक हस्तक्षेप करके कामेकाज के बेहतर अवसर उपलब्ि कराए जाएं तो जाति व्यवस््था को लज़ंदा रख पाना बहुत ही मेुल्श्कि होगा । और जाति के लसधिांत पर आधारित व्यवस््था का बच पाना बहुत ही मेुल्श्कि होगा । अगर ऐसा हुआ तो जाति के विनाश के ज्योलतराव फुले, डलॉ. रामेमेनोहर लोहिया और डलॉ. अंबेडकर की राजनीतिक और सामेाजिक सोच और दिणान का मेकसद हासिल किया जा सकेगा । �
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