September 2026_DA | Page 34

विशे्ष

जाति व्यवस्ा को मेहर््षषि मेनु की देन नहीं मेाना डॉ. अंबेडकर ने

एस. एन. सिंह

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हलषणा मेनु के बारे मेें डलॉ. अंबेडकर ने कहा कि अगर कभी मेनु रहे भी होंगे तो बहुत ही हिम््मती रहे होंगे । उनका कहना है कि ऐसा कभी नहीं होता कि जाति जैसा शिकंजा कोई एक व्यल्क्त बना दे और बाक़ी पूरा समेाज उसको स्वीकार कर ले । उनके अनुसार इस बात की क्कपना करना भी बेमेतलब है कि कोई एक आदमेी क़ानून बना देगा और पीलढ़याँ-दर-पीलढ़याँ उसको मेानती रहेंगी ।
डलॉ. अंबेडकर की सोच और दिणान के सबसे अहमे पहलू पर ग़ौर करने पर पता चलता है कि उनके दिणान ने 20वीं सदी के भारत के राजनीतिक आचरण को बहुत ज़़्यादा प्रभावित किया । उनके दिणान की सबसे ख़ास बात पर जानकारी की भारी कमेी है । यह बात कई बार कही जा चुकी है कि उनके नामे पर राजनीति करने वािों को इतना तो मेालूमे है कि बाबासाहब जाति व्यवस््था के लख़िाफ़ ्थे, लेकिन बाक़ी चीजों पर ज़़्यादातर लोग अन्िकार मेें हैं । डलॉ. अंबेडकर को इतिहास एक ऐसे राजनीतिक चिन्तक के रूप मेें याद रखेगा, जिन्होंने जाति के विनाश को सामेाजिक, आल्थथिक और राजनीतिक परिवतणान की बुनियाद मेाना ्था । यह बात किसी से छुपी नहीं है कि उनकी राजनीतिक विरासत का सबसे ज़़्यादा फ़ायदा उठिाने वाली पार्टी की नेता, आज जाति की संस््था को संभाल कर रखना चाहती हैं, उसके विनाश मेें उनकी कोई रुचि नहीं है । वो्ट बैंक राजनीति के चक्कर मेें पड़ गई । अंबेडकरवादी पाल ्टयों को अब वास्तव मेें इस बात की चिंता सताने लगी है कि अगर जाति का विनाश हो जाएगा तो उनकी वो्ट
बैंक की राजनीति का क्या होगा ।
डलॉ. अंबेडकर की राजनीतिक सोच को लेकर कुछ और भ्रांलतयाँ भी हैं । कांशीरामे और मेायावती ने इस क़दर प्रचार कर रखा है कि जाति की पूरी व्यवस््था का ज़हर मेनु ने ही फैलाया ्था, वही इसके संस््थापक ्थे और मेनु की सोच को ख़त््म कर देने मेात् से सब ठिीक हो जाएगा । लेकिन बाबासाहब ऐसा नहीं मेानते ्थे । उनके एक बहुचलचणात और अकादलमेक भाषण के हवाले
से कहा जा सकता है कि जाति व्यवस््था की सारी बुराइयों को लिए मेनु को ही लज़म्मेेदार नहीं ठिहराया जा सकता ।
डलॉ. अम्बेडकर का यह भाषण वास्तव मेें कोलंबिया विश्वलवद्यािय मेें उनके अध्ययन के बाद पीएचडी की डिग्ी के लिए दालख़ि की गई उनकी ्थीसिस, कास््टस इन इंडिया: देयर मेैकेनिज््म, जेनेसिस एंड डेवलपमेें्ट का सारांश भी है । मेई 1916 का यह भाषण दुनिया की कई
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