September 2026_DA | Page 17

संत रविदास जी की 650िीं जयंती के अवसर पर आयोजित यह अभियान ऐसे समेय मेें सामेने आया है, जब सामेाजिक समेरसता और समेान अवसर का वि्षय साि्गजनिक जीवन मेें ्लर्ातार मेहत्िपूण्ग बना हुआ है । विकास का अथ्ग केि्ल आवथ्गक प्रगति या भौतिक सुविधाओं का विस्तार नहीं है । विकास तब साथ्गक मेाना जा सकता है, जब समेाज के प्त्येक वर््ग को सम्मेान, अवसर और भार्ीदारी प्ाप्त हो । इसी व्यापक विचार को संत रविदास जी की शिक्षाओं से जोड़ते हुए मेुख््यमंत्री ने सामेाजिक समेरसता को मेजबूत करने की आवश्यकता पर ब्ल दिया ।
मेानसिकता के विरुधि एक सशक्त संदेश देता है । ऐसे समेय मेें जब समेाज को विभिन्न स्तरों पर विभाजनकारी प्रवृलत्यों से चुनौती लमेिती है, संत रविदास जी के विचार सामेाजिक एकता और मेानवीय गररमेा का रास्ता दिखाते हैं ।
संत रविदास जी का दिणान भारतीय संत परंपरा मेें मेानव समेानता की मेजबूत आवाज के रूप मेें देखा जाता है । उन्होंने मेनुष्य की पहचान उसके जन््म, जाति अ्थवा सामेाजिक स््थथिति से नहीं, बल््कक उसके कर््म और आचरण से होने की बात कही । उनकी वाणी मेें श्रमे की
मेुख््यमंत्ी के अनुसार, प्रत्येक जिले, बस्ती और घर तक पावन मेा्टी पहुंचाने का उद्ेश्य लोगों को इस ऐतिहासिक और आध्याल्त्मेक परंपरा से जोड़ना है । उन्होंने कहा कि यह मेा्टी केवल लमेट्ी नहीं है, बल््कक उन विचारों का प्रतीक है, जिनमेें मेनुष्य को मेनुष्य के रूप मेें सम्मेान देने की भावना निहित है । इसका वास्तलवक मेहत्व तभी है, जब इसके सा्थ जुड़े संदेश को समेाज अपने व्यवहार मेें भी उतारे ।
उन्होंने कहा कि संत रविदास जी की शिक्षाओं का मेूल सार समेानता, सम्मेान और भाईचारे मेें
संत रविदास जी की 650िीं जयंती के अवसर पर आयोजित यह अभियान ऐसे समेय मेें सामेने आया है, जब सामेाजिक समेरसता और समेान अवसर का वि्षय साि्गजनिक जीवन मेें ्लर्ातार मेहत्िपूण्ग बना हुआ है । विकास का अथ्ग केि्ल आवथ्गक प्रगति या भौतिक सुविधाओं का विस्तार नहीं है । विकास तब साथ्गक मेाना जा सकता है, जब समेाज के प्त्येक वर््ग को सम्मेान, अवसर और भार्ीदारी प्ाप्त हो । इसी व्यापक विचार को संत रविदास जी की शिक्षाओं से जोड़ते हुए मेुख््यमंत्री ने सामेाजिक समेरसता को मेजबूत करने की आवश्यकता पर ब्ल दिया ।
मेुख््यमंत्ी रेखा गुप्ता ने कहा कि यह अभियान केवल किसी धालमेणाक या सांस्कृलतक आयोजन तक सीलमेत नहीं है, बल््कक समेाज मेें समेानता और आपसी सम्मेान की भावना को मेजबूत करने का मेाध््यम है ।
मेुख््यमंत्ी रेखा गुप्ता ने कहा कि वाराणसी से प्रारंभ हुई समेरसता संक्कप यात्ा अब लद्किी पहुंच चुकी है और आने वाले समेय मेें इसे राजधानी के सभी लजिों तक ले जाया जाएगा । उन्होंने इस पहल से जुड़े आयोजकों को शुभकामेनाएं देते हुए कहा कि संत रविदास जी की शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके समेय मेें थीीं । उनका जीवन सामेाजिक भेदभाव और ऊंच-नीच की
प्रतिष्ठिा, सरल जीवन, भल्क्त, मेानवता और सामेाजिक समेानता का भाव दिखाई देता है । यही कारण है कि सलदयों बाद भी उनके विचार समेाज के बड़े वगणा को प्रेरित करते हैं ।
तालक्टोरा स््टेलडयमे मेें आयोजित कायणारिमे मेें पावन मेा्टी के कलश को केवल एक प्रतीक के रूप मेें नहीं, बल््कक संत रविदास जी के विचारों और उनकी सामेाजिक चेतना के संदेशवाहक के रूप मेें प्रस्तुत किया गया । मेुख््यमंत्ी ने कहा कि वाराणसी की भूलमे से लाई गई यह मेा्टी लद्किी के अलग-अलग क्षेत्ों तक पहुंचेगी और इसके सा्थ संत रविदास जी की शिक्षाओं को भी जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा ।
है । समेाज मेें कोई व्यल्क्त जन््म के आधार पर छो्टा या बड़ा नहीं हो सकता । प्रत्येक नागरिक को सम्मेान, अवसर और गररमेा के सा्थ जीवन जीने का अधिकार है । 650वीं जयंती का अवसर इन मेू्कयों को केवल स््मरण करने का नहीं, बल््कक उन्हें सामेाजिक जीवन मेें मेजबूत करने का अवसर भी है ।
समेरसता संक्कप यात्ा के लद्किी पहुंचने को इसी दृष््टटि से मेहत्वपूणणा मेाना जा रहा है । वाराणसी से शुरू हुई यात्ा के मेाध््यम से पावन मेा्टी को राजधानी के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है । इसका उद्ेश्य यह संदेश देना है कि संत रविदास जी की शिक्षाएं किसी एक वगणा, समेुदाय या क्षेत् तक सीलमेत
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