September 2026_DA | Page 14

कवर स्टोरी

अर््थशास्त्, कानून, राजनीति और समेाजशास्त् का गहन अध्ययन किया । लेकिन उनकी शिक्षा का लक्षय केवल व्यल्क्तगत सफलता नहीं ्था । उन्होंने अपने ज्ान को समेाज के उन लोगों की आवाज बनाने मेें लगाया जिन्हें सलदयों तक बोलने का अधिकार तक नहीं दिया गया ।
यही कारण है कि अंबेडकर के शिक्षा संबंधी विचार आज भी केवल ऐतिहासिक मेहत्व के नहीं हैं । भारत जब दुनिया की बड़ी आल्थथिक और तकनीकी िल्क्तयों मेें स््थान बनाने की आकांक्षा रखता है, तब यह सवाल और मेहत्वपूणणा हो जाता है कि देश की शिक्षा व्यवस््था वास्तव मेें कितने बच्चों को आगे बढ़ने का समेान अवसर दे रही है ।
अंबेडकर की दृष््टटि मेें शिक्षा का अर््थ केवल पढ़ना-लिखना सीखना नहीं ्था । शिक्षा व्यल्क्त मेें विवेक, आत््मसम्मेान, तक्क और अधिकार- बोध पैदा करती है । वह व्यल्क्त को यह समेझने की क्षमेता देती है कि उसके सा्थ अन्याय हो रहा है तो वह उसका विरोध कैसे करे और अपने अधिकारों के लिए संवैधानिक रास्ता कैसे अपनाए ।
उनका प्रलसधि संदेश—“ शिक्षित बनो, संगलठित रहो और संघषणा करो”— दरअसल सामेाजिक परिवतणान का पूरा सूत् है । शिक्षा व्यल्क्त को जागरूक करती है, संगठिन उसे सामेूहिक िल्क्त देता है और संघषणा उसे परिवतणान की दिशा मेें आगे बढ़ाता है ।
इस दृष््टटि से देखें तो आज शिक्षा के सामेने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कितने बच्चे विद्यालय मेें नामेांकित हैं । असली प्रश्न यह है कि विद्यालय से निकलने के बाद कितने बच्चे सोचने, सवाल पूछने, लनणणाय लेने और अपने अधिकारों को समेझने मेें सक्षमे हो रहे हैं ।
यदि शिक्षा केवल परीक्षा और अंक प्राप्त करने तक सीलमेत हो जाए तो वह अंबेडकर की क्कपना की शिक्षा नहीं है । शिक्षा का उद्ेश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना होना चाहिए जो अंधविश्वास के बजाय तक्क पर विश्वास करे, भेदभाव के बजाय समेानता को स्वीकार करे और अन्याय के सामेने चुप रहने के बजाय प्रश्न
करने का साहस रखे ।
भारत मेें शिक्षा का विस्तार हुआ है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ा और अवसरों मेें असमेानता अब भी गंभीर चुनौती है । एक तरफ ऐसे विद्यालय हैं जहां आधुनिक प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, प्रशिक्षित शिक्षक, तकनीकी संसाधन और व्यल्क्तगत मेागणादिणान उपलब्ि है; दूसरी तरफ ऐसे विद्यालय भी हैं जहां मेूलभूत संसािनों की कमेी बच्चों की सीखने की क्षमेता को प्रभावित करती है । यही अंतर अंबेडकर के विचारों की कसौ्टी पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है ।
कानून कह सकता है कि हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है, लेकिन केवल अधिकार की घोषणा से समेानता स््थालपत नहीं होती । यदि एक बच्चे के पास निजी शिक्षा, मेहंगी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और आधुनिक तकनीक उपलब्ि है और दूसरे बच्चे को इन्हीं अवसरों के लिए संघषणा करना पड़ता है, तो दोनों के लिए अवसर वास्तव मेें समेान नहीं हैं ।
शिक्षा मेें समेानता का अर््थ यह नहीं कि हर बच्चे को लब्ककुि एक जैसी किताब दे दी जाए । समेानता का अर््थ है कि जिस बच्चे को अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता है, उसे वह सहायता लमेिे ताकि वह भी प्रतिस्पिाणा मेें बराबरी से खड़ा हो सके । यही सामेाजिक न्याय का वास्तलवक अर््थ है ।
भारत मेें प्रतिभा की कमेी नहीं है । कमेी है तो प्रतिभा को अवसर देने की । गांवों, छो्टे कस्बों और आल्थथिक रूप से कमेजोर परिवारों मेें ऐसे असंख्य बच्चे हैं जो उचित मेागणादिणान और संसाधन लमेिने पर देश के श्रेष््ठ संस््थानों और क्षेत्ों मेें स््थान बना सकते हैं ।
मेहंगी कोचिंग, निजी लवद्याियों की फीस, लडलज्टि संसािनों की लागत, आवास और उच्च शिक्षा का खचणा अनेक परिवारों के लिए बड़ी बाधा है । परिणामे यह होता है कि कई बार आल्थथिक रूप से सक्षमे विद्यार्थी केवल इसलिए आगे निकल जाता है क्योंकि उसे बेहतर तैयारी का अवसर लमेिता है । यह व्यवस््था प्रतिभा को नहीं, संसािनों को पुरस्कृत करती है ।
अंबेडकर का चिंतन इसी असमेानता को चुनौती देता है । उनका जीवन बताता है कि प्रतिभा किसी जाति, वगणा या आल्थथिक परिवार की बपौती नहीं होती । अवसर लमेिे तो प्रतिभा अपना रास्ता स्वयं बनाती है । शिक्षा नीति का लक्षय केवल लवद्याियों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए । लक्षय यह होना चाहिए कि गरीबी किसी बच्चे की प्रतिभा की सजा न बन जाए ।
इक्कीसवीं सदी मेें शिक्षा का बड़ा हिस्सा लडलज्टि हो रहा है । मेोबाइल, इं्टरने्ट, लडलज्टि कक्षाएं और कृत्रिम बुलधिमेत्ा ने ज्ान की दुनिया को पहले से कहीं अधिक व्यापक बना दिया है । लेकिन यही तकनीक नई असमेानता भी पैदा कर सकती है ।
जिस बच्चे के पास अपना उपकरण, तेज इं्टरने्ट और घर मेें पढ़ाई का अनुकूल वातावरण है, वह लडलज्टि शिक्षा का लाभ तेजी से उठिा सकता है । दूसरी ओर, जिस परिवार मेें एक ही उपकरण कई लोगों को साझा करना पड़ता है, इं्टरने्ट सीलमेत है या पढ़ाई के लिए उपयुक्त वातावरण नहीं है, उसके लिए लडलज्टि शिक्षा उतनी आसान नहीं है ।
लडलज्टि शिक्षा को केवल तकनीक उपलब्ि कराने की योजना के रूप मेें नहीं देखा जा सकता । इसके सा्थ शिक्षक, प्रशिक्षण, उपकरण, इं्टरने्ट और व्यल्क्तगत मेागणादिणान भी आवश्यक हैं ।
14 flracj 2026