बनाना देश के युवाओं के सा्थ अन्याय होगा । हमेें ऐसी व्यवस््था चाहिए जिसमेें सामेाजिक न्याय भी सुरक्षित रहे और शिक्षा एवं संस््थानों की गुणवत्ा भी लगातार बेहतर होती रहे ।
आरक्षण व्यवस््था की समेय-समेय पर समेीक्षा पर भी स्वस््थ बहस हो सकती है । लेकिन समेीक्षा और समेाल्प्त मेें अंतर है । समेीक्षा का उद्ेश्य व्यवस््था को अधिक न्यायपूणणा, पारदिगी और प्रभावी बनाना होना चाहिए । यह देखना जरूरी है कि वास्तलवक रूप से वंचित व्यल्क्त तक अवसर पहुंच रहे हैं या नहीं और जहां सुधार की आवश्यकता है, वहां संविधान की भावना के अनुरूप सुधार किए जाएं । राष्ट्रीय अखंडता का अर््थ यह नहीं कि सभी नागररकों की सामेाजिक और आल्थथिक परिस््थथितियां समेान हैं । राष्ट्रीय अखंडता का अर््थ यह है कि अलग- अलग पररल्स््थलतयों से आने वाले लोगों को एक ही राष्ट्र मेें सम्मेान, अवसर और भागीदारी का विश्वास लमेिे ।
यदि किसी युवा को लगता है कि व्यवस््था मेें उसके लिए कोई जगह नहीं है, तो यह केवल उसका व्यल्क्तगत संक्ट नहीं, बल््कक लोकतंत् की चुनौती है । और यदि किसी दूसरे युवा को
यह लगता है कि उसके अवसर केवल इसलिए सीलमेत हो रहे हैं क्योंकि वह किसी विशेष सामेाजिक वगणा मेें पैदा हुआ है, तो उसकी चिंता को भी सुना जाना चाहिए । दोनों समेस्याओं का समेाधान एक-दूसरे के विरुधि खड़ा करके नहीं, बल््कक अवसरों का विस्तार करके किया जा सकता है ।
भारत को ऐसी पीढ़ी चाहिए जो आरक्षण के नामे पर एक-दूसरे से लड़ने के बजाय यह पूछे कि देश मेें इतने अवसर क्यों नहीं हैं कि हर योग्य युवा को आगे बढ़ने का रास्ता लमेि सके । आरक्षण को लेकर अंलतमे लक्षय भी यही होना चाहिए कि समेाज मेें ऐसी परिस््थथितियां पैदा हों जहां सामेाजिक पिछड़ापन धीरे-धीरे समेाप्त हो । लेकिन जब तक ऐतिहासिक असमेानताओं के प्रभाव मेौजूद हैं, तब तक संवैधानिक सुरक्षा को केवल राजनीतिक दबाव या भावनात््मक नारों के आधार पर समेाप्त करने की मेांग उचित नहीं कही जा सकती ।
भारत का संविधान सामेाजिक न्याय और समेान अवसर दोनों की बात करता है । इन दोनों को विरोधी मेानना संविधान की भावना को गलत समेझना होगा । सामेाजिक न्याय के बिना
समेानता अधूरी है और गुणवत्ापूणणा शिक्षा त्था अवसरों के बिना सामेाजिक न्याय अधूरा ।
इसलिए देश को आरक्षण की राजनीति नहीं, आरक्षण पर परिपक्व राष्ट्रीय नीति चाहिए । ऐसी नीति जिसमेें न किसी वगणा को भय हो, न किसी वगणा को अपमेान; न किसी युवा को दूसरे युवा का दुश््मन बनाया जाए और न सामेाजिक न्याय को राजनीतिक हल्थयार बनाया जाए, प्रश्न यह नहीं है कि आरक्षण किसे लमेिा और किसे नहीं लमेिा । बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत का लोकतंत् अपने हर नागरिक को यह विश्वास दिला पा रहा है कि यह देश सचमेुच सबका है?
यदि इस प्रश्न का उत्र हां मेें है, तो आरक्षण पर होने वाली बहस भी राष्ट्रीय एकता को मेजबूत कर सकती है । भारत को आरक्षण से आगे बढ़ना है, लेकिन आरक्षण को समेाप्त करके नहीं, बल््कक ऐसा समेाज बनाकर जहां सामेाजिक और आल्थथिक पिछड़ापन धीरे-धीरे समेाप्त हो, अवसरों का विस्तार हो और किसी भी बच्चे का भविष्य उसकी जन््म-पृष््ठभूलमे से तय न हो । यही सामेाजिक न्याय का रास्ता है । यही संविधान की भावना है । और यही राष्ट्रीय अखंडता की वास्तलवक अलनिपरीक्षा भी है । �
flracj 2026 11