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करी । वह बॉन विश्िविद्याल्य, जमवानरी भरी गए । जून, 1927 में, उन्दहें कोलंवब्या विश्िविद्याल्य द्ारा ्डोॉक््टरे्ट करी उपाधि से सम्मावनत वक्या ग्या । वह अपने सम्य के एक दुलवाभ भारतरी्य राजनेता थे वजन्दहोंने कोलंवब्या विश्िविद्याल्य, लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स एवं बॉन विश्िविद्याल्य में अध््य्यन वक्या था ।
्डोॉ. अंबे्डोकर गररीब लोगों, अछूतों के भाग््य के बारे में चिंतित थे । ्डोॉ. अंबे्डोकर चाहते थे कि वे स्ितंत् हों । उन्दहोंने बड़ौदा महाराज करी अध््यक्ता में दलित िगवा समाज करी स्थापना करी । उन्दहोंने समाज के दबे-कुचले िगषों के मुद्ों और आकांक्ाओं को उजागर करने के लिए 1927 में रूढ़रीिादरी वहन्ददू परम्पराओं करी आलोचना करने के लिए एक मराठरी पावक्क पवत्का मूकना्यक और वहन्ददू धमवा में जाति प्रथा के उन्दमूलन के लिए बहिष्कृत भारत करी शुरुआत करी । 1936 में उन्दहोंने इंव्डोपें्डोें्ट लेबर पार्टी करी स्थापना करी । इसने 1937 के बंबई चुनाव में 13 आरवक्त और चार सामान्द्य सरी्टों के लिए केंद्ररी्य विधान सभा का चुनाव लड़ा और रिमशः 11 आरवक्त और तरीन अन्द्य सरी्टों पर जरीत हासिल करी । उनके लिए लोकतांवत्क मूल््य सिवोपरि थे!
सभरी कठिनाइयोों को धत्ता बताते हुए अपनरी पढ़ाई पूररी करने के बाद, ्डोॉ. अंबे्डोकर ने अपना जरीिन दवलतों करी मुक्क्त और सशक्क्तकरर् के लिए समवपवात कर वद्या । इसलिए संघिवा उनके जरीिन का अवभन् अंग बन ग्या । 1927 में, ्डोॉ. अंबे्डोकर ने अपने हजारों अनु्याव्य्यों के साथ महाराष्ट्र के महाड़ में चवदार टैैंक से पानरी परीकर एक शांतिपूर््ण आंदोलन का नेतृत्ि वक्या, जबकि तत्कालरीन बॉम्बे सरकार ने सरी. के. बोले द्ारा प्रस्तुत किए गए 192 प्रस्तािों को स्िरीकार करते हुए अछूतों को टैैंक से पानरी परीने सहित सािवाजनिक निधि से संचालित किए जाने वाले सािवाजनिक जलाश््यों, कुओं और धमवाशालाओं का उप्योग करने करी अनुमति दे दरी थरी ।
्डोॉ. अंबे्डोकर ने 3 माचवा 1930 को नासिक के कालाराम मंदिर में सभरी हिंदुओं के सुरवक्त प्रवेश के लिए एक आंदोलन का नेतृत्ि वक्या ।
वह हिंदू समाज और हिंदू धमवाशास्त् के पूर््ण पररितवान के पक् में थे और सभरी हिंदुओं के लिए समान अधिकार सुरवक्त करने के पक् में थे । वे समावेशिता के पक्धर थे । उनका मानना था कि जातिवाद और अस्पृश््यता हिंदू धमवा, वेदों करी भावना के खिलाफ है । इसका सार गुर्ित्ता, न्द्ययाय, बंधुत्ि और भाईचारे में निहित है । उन्दहें आश्च्यवा हुआ कि इतने उदार हिंदू धमवा में भरी हिंदुओं के एक बड़े हिस्से को अछूत, ्यहां तक कि जानिरों से भरी बदतर माना जाता है । ्यह उनका ददवा था ।
वह हिंदुत्ि के विरोधरी नहीं थे । उन्दहें हिंदू धमवा में आने वाले विकारों के खिलाफ नाराजगरी थरी । उनमें भारतरी्यता और राष्ट्ररी्यता कू्ट-कू्ट
कर भररी थरी । वहन्ददू धमवा से नाराजगरी के चलते उन्दहोनें किसरी अन्द्य विदेशरी धमवा के स्थान पर बौद्ध धमवा को स्िरीकार वक्या जो कि विशुद्ध भारतरी्य संस्कृवत का हिस्सा रहा है और जिसे कई सदियोों से सम्पूर््ण भारतििवा में अशोक जैसे महान सम्राटोों के साथ-साथ हरी सामान्द्य जनता ने खूब स्िरीकार वक्या । 14 अक््टूबर, 1956 को बौद्ध धमवा करी उनकरी स्िरीकृति उनके भारतरी्यता के प्रति अगाध प्रेम का परिचा्यक है । ऐसा कहा जाता है कि जब ्डोॉ. अंबे्डोकर दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधरी से मिले, तो उन्दहोंने उनसे कहा कि वे उस धमवा को स्िरीकार
नहीं कर सकते जो मनुष््यों को बिल्लरी और कुत्तों के रूप में मानता है, और वह एक ऐसे धमवा को अपनाएंगे जो हिंदू धमवा के लिए कम हानिकारक हो । ्डोॉ. अंबे्डोकर के व््यक्क्तत्ि करी बहुमुखरी प्रतिभा अतुलनरी्य थरी । अपने आलोचकों को सुनने करी उनकरी क्मता बेजोड़ थरी । कई मुद्ों पर िरीर सावरकर और महात्मा गांधरी के साथ अपने मतभेदों के बावजूद, वे सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने और अस्पृश््यता और जातिवाद जैसरी घृवर्त बुराइयोों से समाज को मुक्त करने के विचारों में एकमत थे । ्डोॉ. अंबे्डोकर हमेशा सशस्त् संघिवा के खिलाफ थे लेकिन समाज के वंचित िगषों के समान अधिकार को लेकर वंचित िगषों करी आपसरी एकता के साथ अहिंसक संघिषों और आन्ददोलनोें को करने के अ्टू्ट हामरी थे । वह चाहते थे कि समाज के दलित और उत्परीवड़त िगवा एकजु्ट रहें और ज्ान और शिक्ा प्राप्त करें ताकि वे उत्परीवड़त न हों ।
हमारे संविधान के वनमावाता के रूप में, ्डोॉ. अंबे्डोकर ने हमें एक मजबूत, स्िस्थ और अधिक समावेशरी समाज बनाने का मंत् और रो्डोमैप वद्या है । समाज के वंचित िगषों, अल्पसंख््यकों, अन्द्य पिछड़े िगषों, महिलाओं और मजदूरों के लिए उनकरी प्रतिबद्धता आज भरी एक सच्े मागवादशवाक करी तरह राह दिखातरी है । वह केवल दवलतों के नहीं अपितु समानता और समरसता चाहने वाले देश के सभरी 135 करोड़ लोगों करी आकांक्ाओं का प्रतिनिधित्ि करते हैं । उन्दहोंने लोगों के वदलों में एक शाश्ित स्थान हासिल वक्या है । सामाजिक समरसता के क्ेत् में उनका ्योगदान अतुलनरी्य है ।
्डोॉ. अंबे्डोकर को सच्ची श्रद्धांजलि सामाजिक समरसता को का्यम करने, गररीबरी को समाप्त करने का संकल्प लेने और राष्ट्ररी्य अवसरों और सुविधाओं को सांझा करने में सभरी के लिए न्द्ययाय और समानता सुवनक्श्चत करने से होगा । जाति, पंथ, धमवा और क्ेत् के विचारों से ऊपर उठकर हमें भारत को विश्ि गुरु बनाना है । चारों ओर से अच्छे विचार आने दें और उन्दहें अमृत काल में पूरे विश्ि में फैला दें ।
( लेखक हरियार्ा के राज्यपाल हैं ।)
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