October 2026_DA | Page 40

विश्िेषर्

लोककल्यार्कारी है प्राचीन भारतीय विज्ञान

शास्त्ों को ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों की तरह देखना होगा भारतीय ज्ञान संपदा के वैज्ञानिक विश्िेषर् की आवश्यकता

डॉ. पवन वसन्दहा

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दि मैं ितवामान हूँ तो मैं अपने इतिहास का उत्पाद हूँ । इसका अथवा है कि मेरा इतिहास हरी मुझे बता रहा है कि आज मैं क््या हूँ और उसरी इतिहास के आधार पर मैं ्यह त्य करूँगा कि मैं कल क््या बनुंगा । हर मनुष््य के माता-पिता, दादा-दादरी, नाना-नानरी, जिनके बारे में वह जानना चाहता है, वह उसके लिए उसका इतिहास हैं । हर मनुष््य करी जाति उसका इतिहास बतातरी है । उसका घर, उसका मोहल्ला एक इतिहास होता है । हमें हमेशा ्यह बता्या ग्या है कि हमारा देश काफरी महान था, परंतु वह महान क््यों था, ्यह हमें स्पष््ट नहीं है । क््या हम मंवदरों के कारर् महान थे, क््या हम पूजा- पाठ, रामा्यर्, महाभारत के कारर् महान थे? हमारा देश सोने करी वचव्डोय़ा था तो कैसे? क््या मंवदरों में बहुत सोना था इसलिए? इन सभरी का गंभरीर विश्लेिर् करने करी आवश््यकता है । इसके बिना हम भारत को समझ नहीं सकते ।
हर क्षेत् में विशेषज्ञता के कारर् विश्िगुरु र्ा भारत
हम कहते हैं कि भारत पहले विश्िगुरु था । भारत विश्िगुरु किसरी एक क्ेत् में विशेिज्ता के कारर् नहीं था । भारत ्यवद विश्िगुरु था तो रसायनोों के क्ेत् में भरी विश्िगुरु था, भौतिकरी, धातुकमवा, गवर्त, ब्रह््माांड विज्ान, शररीरविज्ान,
राज््य व््यवस्था आदि सभरी क्ेत्ों में भारत विश्िगुरु था । भारत में अहिंसा करी बातें करी गईं, परंतु भारत ्युद्धविद्या में भरी विश्िगुरु था । भारत करी बनरी तलवारें दुवन्याभर के आकर््षण का केंद्र थीं । ्यहाँ करी तलवारें अरब में जरबे हिंद कहलातरी
थीं । हम हवथ्यारों के वनमावार् में भरी सबसे आगे थे । क््या हमने सोचा है कि आज हम जिस हररी वमचवा को बड़री हरी सहजता से खाते हैं, उसकरी खोज कैसे हुई होगरी? सोच कर देखिए । उस सम्य हररी वमचवा तो एक जंगलरी पौधा हरी रहरी
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