October 2026_DA | Page 39

बुवद्जीविता का सवट्टव़िकेट बनाने वाली वामपंर्ी कंपनी ने तो राष्ट्ीय स्ियंसेवक संघ को डॉ. आंबेडकर के विचारों का दुश्मन तक घोषित कर दिया । जबकि सच्ाई इसके बिल्कुि विपरीत है ।
हरी प्रत््येक गांव में“ एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान” करी अवधारर्ा पर जोर देता रहा है । हाल हरी मे सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने वक्तव््य में इसे संघ करी प्रतिबद्धता करार वद्या । ्डोॉ. आंबे्डोकर स््वयं 1949 में पुर्े में आरएसएस के एक का्यवारिम में शामिल हुए और ्यह जानकर आश्च्यवाचकित थे कि आरएसएस में एक-दूसरे करी जाति पूछना िवजवात था । ्यहरी बात महात्मा गांधरी ने भरी 1932 में िधावा में संघ करी एक शाखा के दौरे के बाद आरएसएस के संस्थापक केबरी हे्डोगेवार को बता्या था । गांधरीजरी भरी एक हिंदू संगठन में एक दूसरे करी जाति नहीं पूछने करी इस अनूठरी संस्कृवत से प्रभावित हुए थे ।
तत्कालरीन केंद्ररी्य कानून मंत्री के रूप में, ्डोॉ. आंबे्डोकर समान नागरिक संहिता के पक्धर थे और जम्मू-कश्मरीर में अनुच्छेद 370 को लागू करने का विरोध कर रहे थे । ्डोॉ. आंबे्डोकर ने शेख अब्दुल्ला से कहा कि“ आप चाहते हैं कि भारत आपकरी सरीमाओं करी रक्ा करे, उसे आपके क्ेत् में सड़कों का वनमावार् करना चाहिए, उसे आपको खाद्यान् करी आपूवतवा करनरी चाहिए, और कश्मरीर को भारत के बराबर होना चाहिए, लेकिन भारत सरकार करी केवल सरीवमत शक््ततियां होनरी चाहिए और भारतरी्य लोगों को कश्मरीर में कोई अधिकार नहीं होना चाहिए । इस प्रस्ताि को सहमति देना, भारत के वहतों के खिलाफ एक विश्िासघातरी बात होगरी और मैं, भारत के कानून मंत्री के रूप में, ऐसा कभरी नहीं करूंगा ।“ दूसररी तरफ शुरुआत से हरी संघ अनुच्छेद-370 का विरोधरी रहा है । इस दिशा मे संघ ने जम्मू-कश्मरीर के भारत मे विल्य के वल्ये हरसंभव प्र्यास वक्या था । तत्कालरीन गृह मन्दत्री सरदार प्टेल के आग्रह पर तत्कालरीन सरसंघचालक गोलवरकर जरी ने अक्तूबर 1947 मे राजा हरि सिंह से मुलाकात कर जम्मू-कश्मरीर के भारत मे विल्य करी बात भरी करी । अनुच्छेद-370 के विरोध मे हरी श््यामा प्रसाद मुखजशी ने नेहरु मंवत्मं्डोल से इस्तरीफा देकर जन संघ करी स्थापना करी, जो आगे चलकर भाजपा के रूप मे सामने आ्यरी ।“ एक निशान, एक विधान और एक प्रधान” के संकल्प पर कार््य करते हु्ये मुखजशी ने अपना सिवोच् बलिदान
वद्या । 1967 में, गोलवलकर ने संघ के मुखपत् ऑगवानाइज़र को दिए एक साक्ात्कार में ्यह बात दोहराई,“ कश्मरीर को रखने का केवल एक हरी तररीका है-और वह है पूर््ण एकरीकरर् । अनुच्छेद-370 जाना चाहिए; अलग झं्डोा और अलग संविधान भरी जाना चाहिए । तब से लेकर अनुच्छेद-370 के उन्दमूलन तक संघ अपनरी इस मांग पर अव्डोग रहा । आज जब भारत सरकार ने अनुच्छेद-370 को समाप्त कर जम्मू-कश्मरीर का भारत मे पूर््ण एकरीकरर् वक्या तो ्यह संघ के एक सपने के साकार होने जैसा था, जिसके परीछे संघ का एक बहुत बड़ा आन्ददोलन, लम्बरी रर्नरीवत एवं समर््पण भाव था ।
्डोॉ. आंबे्डोकर ने मुक्स्लम समाज मे फैलरी कट्रता और विशेष रूप से पाकिस्तान के समथवाक रवै्ये के बारे में बहुत मजबूत विचार रखे थे ।
उनका हमेशा ्यह मानना था कि राष्ट्र धमवा से पहले होता है । इसवल्ये स््वयं के विि्य मे उनका प्रसिद्ध वाक््य है कि“ हम सबसे पहले और अन््त मे भारतरी्य हैं”। मुक्स्लम समुदा्य पर उनके विचार“ थाट्स ऑन पाकिस्तान” और“ पाव्टटिशन ऑफ़ इंव्डो्या” मे मिलते हैं । जहां वह लिखते हैं कि“ मुसलमानों को किसरी भरी संघिवा में गैर-मुसलमानों का पक् नहीं लेने का इस्लामरी निषेध, इस्लाम का आधार है । ्यह भारत में मुसलमानों को ्यह कहने के लिए प्रेरित करता है कि वह मुक्स्लम पहले हैं, भारतरी्य बाद में । ्यह भावना है, जो बतातरी है कि भारतरी्य मुक्स्लम ने भारत करी उन्वत में इतना छो्टा हिस्सा क््यों वल्या है, इस्लावमक कट्रता कभरी भरी एक सच्े मुसलमान को भारत को अपनाने करी अनुमति नहीं दे सकतरी है ।
एक चेतावनरी के रूप मे उन्दहोने कहा कि“ अगर भारतरी्य मुक्स्लम अपने आपको देश करी
धरतरी से जोड़ नहीं सका और मुक्स्लम साम्राज््य स्थावपत करने के लिए विदेशरी मुसलमान देशों करी ओर सहा्यता के लिए देखने लगा, तो इस देश करी स्ितंत्ता पुन: खतरे में पड़ जाएगरी ।“ इन दो पुस्तकों में व््यक्त करी गई मुक्स्लमों करी उनकरी धारर्ा लगभग सावरकर के साथ मेल खातरी है, जिनकरी पुस्तक“ हिंदुत्ि” पर आरएसएस का दशवान काफरी हद तक आधारित है । जाहिर है, ्डोॉ. आंबे्डोकर ने जिस भाषा का इस्तेमाल वक्या है वह आरएसएस करी तुलना में तरीखरी कहरी जा सकतरी है ।
इन प्रमुख मुद्ों के अतिरिक्त भरी संविधान मे पंथनिरपेक् शब्द के प्र्योग, वामपंथरी विचारधारा के भारत विरोधरी एजेण््डडे, संस्कृत भाषा को राजभाषा बनाने जैसे अनेक विषयोों पर ्डोॉ. आंबे्डोकर और संघ के विचार ना वसफ्क समान
बुवद्जीविता का सवट्टव़िकेट बनाने वाली वामपंर्ी कंपनी ने तो राष्ट्ीय स्ियंसेवक संघ को डॉ. आंबेडकर के विचारों का दुश्मन तक घोषित कर दिया । जबकि सच्ाई इसके बिल्कुि विपरीत है ।
हैं, बक्ल्क एक दूसरे के पूरक भरी हैं । ्यहरी वजह थरी कि ्डोॉ. आंबे्डोकर 1940 से हरी संघ के सम्पक्क मे थे । वह संघ के का्यषों से बहुत प्रभावित थे । संघ के वरिष्ठ नेता एवं स्िदेशरी जागरर् मंच के संस्थापक दात्तोपंत ठेंग्डोरी से उनका विशेष लगाव था, जिनसे वे सम्य सम्य पर अनेक सामाजिक मुद्ोँ एवं संघ करी कार््यपद्धति पर विमशवा वक्या करते थे । एक तरफ अपने राजनरीवतक वहतों करी वजह से अनेक दलों और संगठनों मे संघ और ्डोॉ. आंबे्डोकर को एक-दूसरे का विरोधरी साबित करने करी होड़ सरी लगरी हुई है । दूसररी तरफ संघ निरंतर समाज मे समानता, समरसता, एकता और राष्ट्ररी्यता जैसे विचारों को स्थावपत करने के कार््य मे लगा हुआ है । संघ का काम करने का अपना एक“ धरीरे-धरीरे जल्दरी चलो” का तररीका है । जिसके माध््यम से वह एकरीकृत वहन्ददू राष्ट्र करी स्थापना मे निरत है । �
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