October 2026_DA | Page 34

साहित्य

हरी पुरुष और स्त्री-चेतना करी दृक्ष््ट्याँ समान नहीं हो सकतीं । सहानुभूति और स्िानुभूति का अंतर रहेगा हरी । पुरुष के लेखन में सहानुभूति हरी आएगरी, स्िानुभूति तो स्त्री-लेखन में आएगरी । इसमें संदेह नहीं कि सुशरीला ्टाकभौरे, रजनरी तिलक, रजतरानरी मरीनू, हेमलता महरीश्िर, अनरीता भारतरी, रजनरी दिसोवद्या, कौशल पवार, नरीलम, पूनम तुषामड़, राधा वाल्मरीवक, जैसरी स्त्री-चेतना करी सशक्त लेखिकाएं दलित साहित््य को समृद्ध कर रहरी हैं ।
मुख्यधारा का साहित्य बनने की प्रक्रिया में दलित साहित्य
अभरी तो दलित साहित््य हिंदरी साहित््य के सामानांतर हरी चल रहा है । लेकिन वह मुख््यधारा का साहित््य बनने करी प्रवरि्या में भरी है । ितवामान हिंदरी साहित््य ब्राह्मर्िादरी है, जबकि दलित साहित््य मौलिक समाजवादरी विचारधारा का साहित््य है । हिंदरी करी अधिकांश पवत्काएँ ब्राह्मर्िादरी लोगों के हाथों में हैं, जो दलित साहित््य को नहीं छापते । लेकिन दलित साहित््य के विरोध में लिखा हुआ छाप देते हैं । कुछ पवत्काएँ ऐसरी भरी हैं, जिनमें दलित-विशेिज् के रूप में ब्राह्मणोों को छापा जाता है । ्यह सब प्रवतरिांवत का लेखन है, जो दलित साहित््य को मुख््यधारा में प्रवतक्ष्ठत होने से रोकता है । इस खेल को समझना होगा । इसे बाबासाहेब ने अपने‘ रिांवत और प्रवतरिांवत’ शीर््षक लेख में विस्तार से समझा्या है । भारत में रिांवत करी रफ़्तार धरीमरी होतरी है, वकन्दतु प्रवतरिांवत करी रफ्तार बहुत तेज होतरी है, क््योंकि उनके हाथों में सत्ता होतरी है, सारे संसाधनों और पूंजरी करी ताकत होतरी है, जबकि रिांवत करने वाले साधनहरीन होते हैं, वे चंदा करके पवत्काएं निकालते हैं, जो एकाध साल चलने के बाद आवथवाक कठिनाइयोों के कारर् बंद हो जातरी हैं । प्रवतरिांवत करी धारा के लोग अक्सर ब्राह्मर् होते हैं और प्रगतिशरील ्या दलित होने का मुखौ्टा लगाए रहते हैं । वे हमारे हरी बरीच घुसपैठ करते हैं, और हमाररी नादानरी के कारर् हमसे हरी सम्मावनत होते रहते हैं । जिस दिन दलित लेखक ब्राह्मणोों करी इस प्रवतरिांवत
को समझ जायेेंगे, उसरी दिन से दलित साहित््य मुख््यधारा का साहित््य बनने लगेगा ।
दलित साहित्य और साहित्यकारों के सार् भेदभाव
ज्यप्रकाश कदवाम ने अपने उपन्द्यास‘ छप्पर’ का विमोचन नामवर सिंह से करवा्या था । पर नामवर सिंह करी एक भरी व्टप्पर्री‘ छप्पर’ पर नहीं है । ्डोा. तुलसरी राम ठाकुर नामवर सिंह के पैर छूते थे, पर आप नामवर सिंह का कोई लेख तुलसरी राम के कृतित्ि पर दिखा सकते हैं? जब‘ मुर््दहिया’ पर आ्योजित का्यवारिम में नामवर सिंह को बोलने के लिए बुला्या ग्या, तो उन्दहोंने अपनरी पूररी स्परीच में एक बार भरी तुलसरीराम का नाम नहीं वल्या ।‘ लेखक करी कृति... लेखक करी कृति’ कहते रहे । ्यह उस सवर््ण साहित््यकार का व््यवहार है, जिनके तुलसरी राम जरी पैर छूते थे । एक और उदाहरर् देता हूँ । मैं‘ जन संस्कृवत मंच’ करी राष्ट्ररी्य काररर्री में था, उसरी में रामजरी रा्य भरी थे, जिनको मुझे जोड़ने का श्रे्य जाता है । उसमें मैनेजर पाण््डोे्य भरी थे, जो अध््यक् भरी चुने गए थे । तब तक मेररी कई किताबें आ चुकरी थीं । लेकिन‘ जन संस्कृवत मंच’ के किसरी भरी सवर््ण लेखक ने, न रामजरी रा्य ने, और न मैनेजर पाण््डोे्य ने, मेररी किसरी किताब पर कोई चचावा कभरी नहीं करी । और जब मैंने‘ जन संस्कृवत मंच’ के का्यवारिमों में जाना बंद कर वद्या, तो किसरी भरी अध््यक् ्या सवर््ण सदस््य ने हमारे न जाने करी वजह को जानने करी कभरी कोशिश नहीं करी । असल में हम जिस जातिवाद से लड़ रहे हैं, और जिसे खत्म करना चाहते हैं, वह अधिकांश सवर््ण साहित््यकारों में जड़ जमाए बैठा हुआ है । वे एक सरीमा तक हरी दलित करी बात करते हैं, एक सरीमा तक हरी कबरीर और आंबे्डोकर का समथवान करते हैं, लेकिन वास्ति में वे तुलसरीदास और गाँधरी के हरी समथवाक हैं । वे नहीं चाहते कि जाति व््यवस्था वम्टे, क््योंकि उनके प्रार् उसरी में बसते हैं । उसरी के कारर् वे उच् बने हुए हैं, और उसरी के कारर् हम उनकरी नजरों में नरीच हैं । फिर वे दलित को सम्मान कैसे दे सकते हैं?
दलित समाज की उप-जावतयों में ब्ाह्मर्िादी व्यिस्र्ा
्यह सच है कि दलित समाज करी उपजातियोों में एकता नहीं हैं, उनके बरीच ऊँचनरीच करी ब्राह्मर्िादरी व््यवस्था का्यम है, लेकिन ्यह कहते हुए हम भूल जाते हैं कि दलित समाज उसरी हिंदू समाज से निकला है, जो जातिव््यवस्था पर खड़ा है । एक बात ्यहाँ और भरी गौरतलब है, और वह ्यह कि जावत्यां केवल दलित समाज में हरी हैं, वद्ज समाज में जावत्यां नहीं हैं, वहाँ वर््ण हैं । ब्राह्मर्, क्त्री और वैश््य समाजों में कुल और गोत् हैं, और उनमें समान गोत् और समान कुल में विवाह नहीं होता है । वहाँ शुक्ल, मिश्र, पाण््डोे्य, शमावा आदि आपस में विवाह करते हैं, इसलिए वे एक िगवा बनकर रहते हैं, इसकरी तरह क्त्री और वैश््य भरी अपने से वभन् गोत् में विवाह करते हैं और िगवा के रूप में रहते हैं । वकन्दतु दलित एक िगवा नहीं है, वह हजारों जातियोों का समूह है, जो अपनरी-अपनरी जातियोों में हरी विवाह करते हैं, इसलिए उनमें एक दलित िगवा का वनमावार् नहीं हो पा्या । बाबासाहेब ने
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